Main Aur Meri Tanhai

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Sumit


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हंगामा है क्यों बरपा

Posted On: 9 Aug, 2015  
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स्वतंत्रता दिवस पर भाषण

Posted On: 16 Aug, 2014  
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आप तो ऐसे न थे

Posted On: 9 Dec, 2013  
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Junction Forum Others social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बे-शर्म

Posted On: 30 Nov, 2013  
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Others social issues कविता मेट्रो लाइफ में

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एक खबर यह भी (लघु कथा )

Posted On: 4 Sep, 2013  
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गुलाबी चूड़ियाँ ( नागार्जुन जी की याद में )

Posted On: 30 Aug, 2013  
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रक्षाबंधन

Posted On: 21 Aug, 2013  
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कागज़ी आज़ादी

Posted On: 14 Aug, 2013  
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Entertainment Hindi Sahitya Junction Forum Others में

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मेरे सपनो का भारत

Posted On: 12 Aug, 2013  
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Career Junction Forum Others Others में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: aksaditya aksaditya

प्रिय सुमित जी, सादर अभिवादन! आपने हर पहलू को बहुत ही बारीकी से विश्लेषण किया है. आपके दवरा बताये गए सुझाव अनुकरणीय है. पर इसकी शुरुआत कैसे और कहाँ से होनी चाहिए अभी भी अनुत्तरित है. मानता हूँ इसकी शुरुआत घर से ही होनी चाहिए. घर से समाज, समाज से क्षेत्र और उसके बाद व्यापकता.को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इसके लिए मीडिया को पहल करने की जरूरत है.फ़िल्में और सीरियल्स पर सेंसरशिप जरूरी है. पोर्न साइट्स प्रतिबंधित होने चाहिए...इन सबमे हमारे जान प्रतिनिधि, समाज के मुखिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी योगदान आवश्यक है...बाकी आपने बहुत कुछ लिखा है इस आलेख को भी ब्यापकता मिलनी चाहिए ..आपके इस आलेख को अन्य माध्यमों से भी प्रसारित प्रचारित किया जाना चाहिए. ऐसे विचार को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाना चाहिए....और भी बहुत कुछ युवाओं को रचनात्मक कामों में अधिक से अधिक समय गुजरना चाहिए, अध्यात्म और योग का प्रयोग यहाँ होने चाहिए...मेरे ऐसे ही कुछ विचार हैं... आपको अच्छे आलेख के लिए बधाई और शुभकामनाएं

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा:

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

सुमित भाई चिन्ता न करो, जल्दी ही पिक्चर रिलीज़ होगी और ट्रेलर्स का क्लाईमेक्स भी लोग जल्दी ही भूल जाएंगे । 'आप' ने एक नेक काम अवश्य किया है, वह यह कि मित्रवर श्रीमान प्रदीप जी कुशवाहा, आप, और हमारे जैसों को रोज़गार का एक बेहतरीन नुस्खा उपहार स्वरूप प्रदान किया है । मित्रवर की जल्दी ही घोषित होने वाली 'बाप' पार्टी के हम दोनों एवं श्रीमान जवाहरलाल जी भी, राष्ट्रीय महासचिव होंगे । शेष काबिल लोग तब तक क्यू की शोभा बढ़ाएंगे, बाद में योग्यतानुसार सभी को अवसर अवश्य मिलेगा । मित्रवर सीएम की बजाय सीधे पीएम के उम्मीदवार होंगे, और जाहिर है कि नमो के कट्टर प्रतिद्वन्द्वी भी । आप सोच रहे होंगे कि यदि 'आप' का फ़ुल फ़ार्म 'आम आदमी पार्टी' है, तो इस 'बाप' का क्या होगा ? अजी 'बदनाम आदमी पार्टी' के अलावा और क्या हो सकता है भला ? अब आप से मात्र इतना अनुरोध होगा, कि उधर जाते हुए ज़रा किसी पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवा कर, उसी तिथि में जन्तर-मन्तर के लान को बुक अवश्य कराते आएंगे, ताकि बाप जी यथाशीघ्र 'बाप' पार्टी की घोषणा कर सकें । तब तक होली भी आ ही जाएगी । धन्यवाद !

के द्वारा:

आदरणीय @aksakitya जी, आपके एक एक शब्द से सहमत हूँ। सुमित जी , आपको बताना चाहता हूँ कि आम आदमी पार्टी केवल  राजनैतिक दल नहीं है, बल्कि एक व्यवस्था परिवर्तन की चाहत रखने वालों का संगठन है। आप की सफलता का एक सकारात्मक परिणाम तो हमें तुरन्त ही  प्राप्त हो गया कि कल्याण सिंह द्वारा यूपी में जोड़तोड़ कर और  सुखराम के पाँच विधायकों के साथ हिमाचल में सरकार बनाने   वाली बीजेपी आज नैतिकता की बात करने लगी है। जबकि हिमाचल में उस समय हिमाचल के प्रभारी नरेन्द्र मोदी थे। आप क्या चाहते हैं  कि आम आदमी को भ्रष्ट काँग्रेस और कमीशन खाने वाली तथा मंदिर और मस्जिद के नाम पर सत्ता पाने वाली बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना लेना चाहिये? जिससे जनता कहे  कि आम आदमी और इन भ्रष्ट दलों में कोई अंतर नहीं है। अरविन्द तो सत्ता का लालची है। आपने ABP न्यूज पर कल का सर्वे देखा होगा। जिसमें जनता ने आम आदमी को काँग्रेस या बीजेपी से मिलकर सरकार बनाने को नकार दिया। दिल्ली की जनता पूरे देश का प्रतिनिधि्त्व करती है। यहाँ के अधिकाँश लोग वैचारिक रूप से शिक्षित हैं। यहाँ धर्म और जाति का राजनीति का कोई अधिक प्रभाव नहीं है। यही कारण है कि मायावित का सूपड़ा साफ है। बीजेपी को जो सीट मिलीं हैं, वह बीजेपी या नरेन्द्र मोदी की जीत नहीं है। दिल्ली में नरेन्द्र मोदी ने  जहाँ जहाँ भी रैली की है वहाँ वहाँ से आम आदमी जीता है। बीजेपी यदि जीती है तो केवल कहीँ कहीँ आम आदमी कार्यकर्ताओं की आपसी गुटवाजी से या फिर इसलिये कि वहाँ कि जनता  ने यह समझा कि शायद आम आदमी को बोट देने से काँग्रेस न जीत जाये और मेरा वोट बरवाद चला जाये। यह भी एक सर्वे से विदित हुआ है। यहाँ हर उस आदमी के मुँह से जिसने बीजेपी को वोट दिया था, यही आवाज निकल रही है कि अबकी चुनाव में  केवल आम आदमी को वोट दिया जायेगा। सुमित जी, आपको शायद शादय विदित नहीं होगा कि इस बार आम आदमी की वजह से चुनाव में दारू और नोट बाँटने का प्रचलन नाम मात्र का ही रहा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय सिंह साहब के कमेन्ट से सहमत होते हुए , मेरा भी सोचना यही है की आप पार्टी का स्टेंड किसी के भी साथ नहीं जाने का, बिलकुल सही है| समर्थन देकर अपने से छोटे दलों को सरकार बनाने देने के मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों का पुराना रिकार्ड बहुत ही खराब है| आप एक नया राजनीतिक दल है, जो कुछ वायदों के साथ राजनीति में आया है और शुरुवात में ही अवसरवादी व्यवहार उसके अस्तित्व के लिए ही संकट बन सकता है, विशेषकर चालाक और घुटी हुई भाजपा, कांग्रेस और देश के दानव जैसे मीडिया उसे खत्म करने में कोई देर नहीं लगायेंगे| हमारे देश में सिद्धांत सिर्फ कथनों और पुस्तकों में ही सुशोभित हैं और व्यवहार से वैसे ही गायब हैं, जैसे गधे के सर से सींग और देश की जनता उसी अनुसार अकसर बुद्धि से कम और भावनाओं से ज्यादा व्यवहार करती है| यह हम राजनीति में सबसे अधिक चरितार्थ होते देखते हैं| ऐसी परिस्थिति में आप के द्वारा सत्ता के लिए थोड़ा भी हलचल करना, लोगों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करने के लिए अच्छे अवसर कांग्रेस और भाजपा को उपलब्ध कराएगा| इसलिए , आज कुछ भी हो और भविष्य में भी कुछ भी हो, आप को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद ही सरकार बनाने के बारे में सोचना चाहिए, चाहे कितनी भी देर क्यों न हो| 

के द्वारा: aksaditya aksaditya

प्रिय सुमित जी, सादर! जहाँ तक मेरी समझ है और संविधान विशेषज्ञों की राय सुन पाया हूँ, पहली बड़ी पार्टी भाजपा है और निमंत्रण उसे जायेगा. अगर वह इंकार करती है तो निमंत्रण दूसरी बड़ी पार्टी AAP को जायेगा. जब ३२ सीट पाकर भाजपा सरकार बनाने का जोखिम नहीं उठा सकती फिर AAP कैसे उठा पायेगी. कहीं उसकी सरकार को गिरा दिया गया तो? बिना बहुमत की पार्टी बदलाव कैसे लायेगी. इसलिए अंतिम विकल्प राष्ट्रपति/राज्यपाल शासन ही है. सभी अपनी अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं. आम आदमी पार्टी को मिली अपार सफलता से वे और आम जनता भी खुश है पर एकाध कोली जैसे लोग अपनी खुशी को पचा नहीं पाते ... जुलूस निकालने की जरूरत ही नहीं थी.... मैं भी यही कहूँगा ...आगे आगे देखिये होता है क्या? अच्छा आलेख के लिए बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: allrounder allrounder

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आप समर्थक चाहते हैं कि आप जैसे थे, वैसे ही रहें। आप (बीजेपी) जैसा चाहते हैं आप (आम आदमी) वैसे न बने। सुमित जी या तो आप सच्चाई को नहीं जानते या फिर  सच्चाई  को नजर अंदाज कर रहे हैं। बीजेपी और काँग्रेस में क्या आपको  अधिक अंतर दिख रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि ये एक ही  थैले के चट्टे बट्टे हैं। एक साँपनाथ तो दूसरा नागनाथ है।इनके नेताओं के आपस में राजनैतिक, पारिवारिक, व्यापारिक एवं  व्यावहरिक संबंध हैं। सरकारी योजनाओं में कमीशन की हिस्सेदारियां हैं। जहाँ तक आम आदमी का सवाल है वह   सत्ता परिर्वतन में नहीं  बल्कि व्यवस्था परिवर्तन में यकीन रखती है। यदि वह इनमें से किसी का  समर्थन लेती या देती है तो उसके लिये आत्महत्या  करने के समान है।अधिकाँश दिल्ली के आम आदमी की तो यही सोच हैजहाँ  तक आपने  मर्यादा में प्रतिक्रिया देने की बात कहीं तो मान्यवर यह बतायेंगे कि  वह मर्यादा कौन तय करेगा।पाखंडी धर्याचार्य या भ्रष्टनेता।मर्यादाओं का तो ये लोग उलंघन करते हैं और आप है कि आम आदमी पर  आरोप लगा देते हैं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: Sumit Sumit

सुमित बहुत सुन्दर, सटीक, सार्थक, एक जलता बलता सन्देश, बधाई और बड़ा होने के नाते आशीर्वाद ! तुमने बिलकुल कांटे की बात कही है की हमें असली आजादी तो अभी मिली ही नहीं, केवल कागजी आजादी मिली है ! आजादी मिली है, उन लोगों को जो सता पर काविज हैं और आम आदमी का और गरीब का रक्त चूस रहे हैं ! चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, ये बरसाती मेढक की तरह टर टराते हैं, गरीबों के घरों में जाकर उनका नमक खा आते हैं अगर जीत गए तो मंत्री नहीं तो अन्तरिक्ष में समा जाते हैं, क्यों की इनके कुकर्म अगली सरकार द्वारा बाहर आते हैं ! तुम मेरे ब्लॉग पर आये अच्छा लगा ! कविता में जो बदलाव बतलाया मैंने कर दिया, धन्यवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

इतनी जल्दी हार क्यों मान ली..थोडा आगे चलते तो हाथ में मोबाइल लिए हुए गरीब भी मिलते , जिनके माता पिता सडको पर कबाड़ इकठ्ठा करते हैं और बच्चे पढने लिखने के सिवा दुनिया का हर काम कर के गरीब कहलाते हैं, जिनको गरीबी भत्ता मिलने में भी उतना ही इंटरेस्ट है जितना फर्स्ट डे फर्स्ट शो की मूवी देखने में ...गरीबो की क्या कमी है...गोद में बच्चा लिए भीख मांगती हट्टी कट्टी जवान गरीब माएं, खर पतवार की तरह पैदा कर के जुर्म करने के लिए सडको पर छोड़ दिए गए गरीब अपराधी माँ बाप के भावी अपराधी गरीब बच्चे...टेरिटरी के लिए लड़ने वाले बोरे के नीचे नोट बिछा कर सोने वाले गरीब भिखारी..बहुत लम्बी लिस्ट है...... और कोई न मिलता तो हम गरीब तो हैं ही.."बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए -अहले करम देखते हैं...."

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

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के द्वारा: Shweta Shweta

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के द्वारा: Sumit Sumit

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बहूत ही सुन्दर गजल , आपको शुभकामनाये, आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

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के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

के द्वारा: Rita Singh, 'Sarjana' Rita Singh, 'Sarjana'

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के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

मैं भी कृष्ण को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ कृत्य मानवीय दृष्टि से क्षम्य नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक कारणों से अपने विचारों पर अटल हूँ। दिनेश “आस्तिक” जी ..... आपने अपनी प्रतिकिर्या में जिन तार्किक कारण का उल्लेख किया है मैं तुच्छ प्राणी उनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या जानना चाहता हूँ ताकि मेरा ज्ञानवर्धन हो सके और मैं अज्ञानी आपसे कुछ ज्ञान पा सकू ..... किरपा करके मेरा मार्गदर्शन कीजिये ..... उम्मीद है की आप मुझको निराश नहीं करेंगे ..... :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D (सुमित जी लैटर में जो टविस्ट आ गया वोह जंचा नहीं -पूरा पत्र शुरू से अंत तक एक ही भाव लिए हुए होना चाहिए था -प्रेम पत्र में मरना और मारना तथा मर गया , अच्छा नहीं लगता कुछ )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

सुमित जी , बिल्कुम सही कहा है आपने इस कहानी में ये कहानी जिसकी की भी है वे खुशकिस्मत है कि उन्हें किसी तरह उनकी मंजिल मिली दुसरो को तो मौत मिलती है या फिर समझौता करके साँस लेना पड़ता है पर इसे कोई समझना ही नहीं चाहता कि अब तो समझो आज कल के कुछ पढ़े - लिखे युवा भी उन कुरीतियों का सामना करने में लगे है, अब उन्हें कैसे समझाये भगवान उन्हें कौन सी सिक्षा दे कि समझे कि जात - पात का भेद - भाव सही नहीं है प्यार तो भगवान ने बनाया है शिव - पार्वती बे भी तो प्यार करके ही शादी कि थी उन्होंने तो कोई रिश्ता और भेद - भाव नहीं देखा खुद में उन्होंने तो नहीं कहा इन्सान को कि भेद करो फिर क्यों लोगो ने खुद ये कुरीतिय बनाई और उसके लिए भगवान से भी नहीं डरते!

के द्वारा: MEENU MEENU

ये समाज, जिसकी आप लोग दुहाई दे रहे है, ये समाज दो लोगो को तो मार सकता है, मगर दो लोगो को मिला नहीं सकता……ये समाज औरो की हिम्मत का उदाहरण तो दे सकता है, मगर अपने परिवार में ये सब होते नहीं देख सकता,,,,ये समाज हीर-राँझा, लैला -मजनू के प्रेम की दास्ताँ तो सुना सकता है, मगर उसे ऐसे प्रेमी युगल अपने परिवार में नहीं चाइये…………..बहुत खूब...परन्तु अभी भी दोगले चेहरे वाले समाज पर थप्पड़ ठीक से नहीं जड़ा आपने ...जो कुछ शेष रह गया है उसे जरुर पूरा करता और नव-विवाहित जोड़े को शुभकामना भी देता परन्तु "आलोक श्रीवास्तव" का एक ग़ज़ल पढ़ने के बाद पिछले तीन दिनों से होश में नहीं हूँ………….इस लिए वह ग़ज़ल आपके साथ-साथ उन जोड़ो के लिए भी पेश करता हूँ ताकि पढ़ने के बाद आप सभी भी बेहोश हो जाए.......... सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: Sumit Sumit

मैं बस में बैठा इसी बात को सोच रहा था और सोचते सोचते मेरे मन में कई विचार आ गए जैसे : अगर कल मेरे पत्नी ऐसी हुयी तो क्या होगा, कल मेरी लड़की ऐसी हुयी तो क्या मैं उसे ये सब करने से रोक पाउँगा, क्या यही हमारे भारत की संस्कृति है, शायद इसका यही इलाज़ है कि शराब के कारोबार को ही बंद कर दिया जाये, मगर फिर हमारी सरकार को मिलने वाली बड़ी धनराशी रुक जाएगी,,….मगर हमारे देश का कौन सा विकास हो रहा है इस धन से, ये तो नेता अपने लिए खर्च कर रहे है,,,,,तो फिर बंद ही कर दे इस कारोबार को,,,,,,,न रहेगी शराब, न होंगे पीने वाले, क्युकी रहेगी शराब तो, रहेंगे जिन्दा पिने के बहाने बढ़िया लेखन ! सही मार्गदर्शन करती रचना !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अच्छा लिखा आपने मगर एक बात आपसे कहना चाहूंगी वो ये कि शराब से सिर्फ लड़कियों का ही नहीं बल्कि लडको का भी स्वस्थ्य प्रभावित होता है गृह कलेश, मानसिक तनाव, नशे मे साथी का उत्पीडन, शराब के नशे मे ड्राइविंग जिससे दुर्घटना कि सम्भावना बढ़ जाती अधिकतर सडक दुर्घटना रात को और वो भी शराब के नशे मे ही होती है | साथ ही शराब के दूरगामी परिणाम भी होते है जैसे सांस कि नालियों का प्रभावित हो जाना लंग्स खराब हो जाना, हार्ट फेलियर, Nervous सिस्टम, और भी बहुत से शराब के दुष्प्रभाव होते है जिनके विषय मे नेट मे काफी कुछ है | शराब किसी के लिए भी ठीक नहीं है आज कल तो छोटे बच्चो को भी ड्रिंक करते हुए देखा है | स्वस्थ्य समाज के लिए चाहे लड़का हो लड़की या कोई भी शराब सही नहीं इससे सिर्फ और सिर्फ नुक्सान ही है |

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रिय सुमित बाबू, आपने तो मंच पर हडकंप मचाया हुआ है, ब्लोगर नेता बनकर किसी अन्य मंच की बखिया उधेड़ रहे हो, आपने लिखा है की मैंने कमियों से बार बार कराया है तो महोदय ये पंक्ति भी गलत है आपको लिखना चाहिए की मुनीश जी ने मेरे लेखन की कमियों से मुझे अवगत कराया, अब आपने तो ऐसे लिखा जैसे मैं जबरदस्ती कमियाँ ढूंढ कर आपके सामने ले आता हूँ ....... खैर जिस विषय पर आपने लिखा और मंच पर आँख मूंदकर सबने सहानुभूति भी दी वो संभव नहीं है की आपके सेव ड्राफ्ट को कोई और पढ़ ले...... आप से जरूर कोई तकनीकी गलती हुई होगी...... मेरी व्यक्तिगत अपनी साईट भी है ..... bharatvoice . com के नाम से ...... मैंने इस विषय में अपने तकनिकी सहायक से बात की जो बहुत सी अन्य साइट्स को चलाता है उसका भी यही कहना है की ये संभव नहीं है..........! अब रही बात आपकी कृति को पब्लिश न करने की.......... तो ये कोई तानाशाही नहीं है ये उस मंच के अपने नीयम होंगे जिसके आधार पर वो किसी लेखक की कृति को पब्लिश करते होंगे .........! अब इस तथ्य को आप इस आधार पर समझिये की आप इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं आपका एडमिशन कुछ कॉलेज में हो जाता है और कुछ में नहीं या आप आई आई टी से चूक जाते हैं तो क्या वो संस्थान जिनमें आपका एडमिशन नहीं हो पाया तो क्या वो सब तानाशाही कर रहे हैं या उनके मापदंडों के हिसाब से आपकी योग्यता में कमी है ........! सोच कर बताइये आप किसी कंपनी मैं नौकरी के लिए जाते हैं और मालिक आपको नहीं रखता तो क्या वो तानाशाह है.........! आप jj की तारीफ़ करैं ये अच्छी बात है पर दूसरों की बुराई करैं ये अच्छा नहीं है.......! .........! अब बहुत हो गया वर्ना आप कहेंगे की मैं कमियों से सामना करवा रहा हूँ ........ हाहाहा

के द्वारा: munish munish

अजय जी कीमती वक़्त देने के लिए शुक्रिया..........दूसरी बात ये है कि मैं नहीं जनता उसे अमेरिकन सर्वर निंग वाले चलते है या कोई और ,,मुझे इतना पता है कि उसे प्रमुख कार्यकर्त्ता कुछ हिन्दुस्तानी है,...........Save as draft को पढ़ा गया है, इसलिए ही मैंने कहा कि Privacy zero है इस मंच की,,,,,परन्तु मैंने कही भी मंच का नाम नहीं लिखा.....मैंने उसके बाद एक रचना और डाली, जिसका अभी तक कोई जवाब ही नहीं आया ................सबसे बड़ी बात जब वो हमारे draft में save कथावस्तु को पढ़ सकते है तो आपका पासवर्ड भी हो सकता है उन्हें पता हो..............मैंने अपने इस ब्लॉग में कही नहीं लिखा की मैंने कविता लिखी थी, तो आपको कैसे पता की मैंने कविता लिखी थी क्युकी आपने ही कहा "मैं कविता के नाम पर गोबर गलीज कुछ भी लिखू उनके बाप का क्या जाता है".................अब खुद ही सोचिये जिस को मैंने पढ़ा और उस मंच के कार्यकर्त्ता ने पढ़ा, उसके बारे में किसी तीसरे (यानि आपको ) कैसे पता ............. मात्र पैसो का लालच देके किसी के साथ खिलवाड़ अच्छा नहीं,,,,,,आखिरकार मैंने उस मंच को छोड़ दिया ....इसे अच्छा यदि किसी अख़बार में भी अपनी रचना भेजी जाये तो पुरुस्कार तो वहाँ भी मिल जाता है,,,,,,,NBT, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि आदि मंच है जहां लोग ब्लॉग लिखते है मगर वहाँ किसी के साथ ऐसा नहीं होता ......................और कोई सवाल बन्धु

के द्वारा: Sumit Sumit

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सुमित जी, आप संभवतः www.openbooksonline.com के बारे में कह रहे है, वहाँ साहित्य को बढ़ावा देने के नाम पर हरेक महीने ५-५ नगद पुरस्कार क्रमश: ११००,१००१,५५१,५०१ और २५१ का दिया जाता है और प्रमाण पत्र भी | घटिया रचनाओं को वो अनुमोदित नहीं करते है बल्कि उसे सुधारने के लिए कहते है, यह तो सरासर ताना शाही है भाई, मैं कविता के नाम पर गोबर गलीज कुछ भी लिखू उनके बाप का क्या जाता है हलाकि मेरे जानकारी के अनुसार वो साईट अमेरिकन सर्वर निंग पर चलता है जो उच्च तकनीक पर चलता है और निंग वाले गोपनीयता का बहुत ध्यान रखते है यहाँ तक की यदि आप अपनी पोस्ट को Save as draft कर ले तो ये तानाशाह लोगो को तो छोड़िये निंग सर्वर वाले भी नहीं देख सकते है | खैर उससे क्या यहाँ यह बात कौन जानता है , तानाशाहों को गाली देना तो हमारा अधिकार है और अभिव्यक्ति की आजादी भी कोई चीज है | हम लोग तो आजादी में विश्वास रखते हैं जो कुछ भी लिखे वो प्रकाशित होना चाहिए, वाह वाह तो मिल ही जायेगा, नहीं मिलेगा तो मैं भी उनकी रचनाओं पर वाह वाह नहीं करूँगा |

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सुमित जी, आप संभवतः के बारे में कह रहे है, वहाँ साहित्य को बढ़ावा देने के नाम पर हरेक महीने ५-५ नगद पुरस्कार क्रमश: ११००,१००१,५५१,५०१ और २५१ का दिया जाता है और प्रमाण पत्र भी | घटिया रचनाओं को वो अनुमोदित नहीं करते है बल्कि उसे सुधारने के लिए कहते है, यह तो सरासर ताना शाही है भाई, मैं कविता के नाम पर गोबर गलीज कुछ भी लिखू उनके बाप का क्या जाता है हलाकि मेरे जानकारी के अनुसार वो साईट अमेरिकन सर्वर निंग पर चलता है जो उच्च तकनीक पर चलता है और निंग वाले गोपनीयता का बहुत ध्यान रखते है यहाँ तक की यदि आप अपनी पोस्ट को Save as draft कर ले तो ये तानाशाह लोगो को तो छोड़िये निंग सर्वर वाले भी नहीं देख सकते है | खैर उससे क्या यहाँ यह बात कौन जानता है , तानाशाहों को गाली देना तो हमारा अधिकार है और अभिव्यक्ति की आजादी भी कोई चीज है | हम लोग तो आजादी में विश्वास रखते हैं जो कुछ भी लिखे वो प्रकाशित होना चाहिए, वाह वाह तो मिल ही जायेगा, नहीं मिलेगा तो मैं भी उनकी रचनाओं पर वाह वाह नहीं करूँगा |

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के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

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” मेरी और नारद जी की बहुत बहस हुयी…उसके बाद निर्णय हुआ कि धरती पे सबसे पहले उस इंसान को ढूंढा जाये, जो मुझे मानता भी हो और नहीं भी ,,,,,,,,,,नारद जी पुरे एक सप्ताह बाद मेरे पास आये और एक प्राणी का नाम लिया : सुमित !!!! .मैं बीच में बोल पड़ा : मेरा नाम क्यों ? उन्होंने कहा : मैंने भी ऐसे ही पूछा कि सुमित ही क्यों ? तो नारद मुनि ने मुझे जवाब दिया ” प्रभु ये वो प्राणी है, जो ख़ुशी मिलने पे तो आपको कुछ नहीं कहता, मगर गम मिलने पर हमेशा आपको कोसता है ,, कभी आपके मंदिर में नहीं जाता मगर डर लगने पे आपको याद करता है …….इसलिए ये वैसा ही प्राणी है जैसे कि आपको तलाश थी ………………..” प्रभु के प्यारे प्राणी सुमित को सलाम ..बहुत बहुत शुभ कामनाएं ..ऐसे प्रभु के प्यारे और अधिक अवतरित हों सुन्दर --हास्य व्यंग्य का पुट लिए भ्रमर ५

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के द्वारा: rajeevsharma rajeevsharma

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वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

सुमित जी, क्या फायदा कन्या भोज में ऐसे पुरुष बुलाने का. मगर मुनीश जी की ये बात तो सही है की यह व्यक्तिगत सोच होती है वरना मेरे देखने में जो आया है वह ये कि कन्याएं लायेंगे कहाँ से इसीलिए काम वाली बाइयों को बोल दिया जाता है कि बच्चों को लेकर आना.आपको शायद ज्ञात होगा कि कन्या भोज में एक वर्ष से पांच वर्ष तक कि कन्याओं को भोजन कराने का ही उम्र के अनुसार महत्त्व धार्मिक किताबों में वर्णित है.जिसकी पूर्ति हाई सोसायटी से अधिक निम्न वर्ग से आसानी से होती है. फिर यदि हाई सोसायटी में किसी के बच्चे एक दो वर्ष कि आयु के हों तो वह उन्हें दुसरे के घर खाने पर नहीं भेजने के लिए बहाना बनाना उपयुक्त समझेंगे. खैर जो भी हो प्रसाद वितरण में छोटे बड़े का फर्क मन में लाना भी इश्वर को प्रिय ना होगा क्योंकि सभी मानव उस एक इश्वर कि ही संताने हैं.धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

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के द्वारा: Sumit Sumit

सुमित जी, मैंने भी इन्सान के लिए ही लिखा है मगर शायद ठीक से कहना ही नहीं आया. अरे भाई हर व्यक्ति चाहता है उसे निपुण सुन्दर स्वस्थ पत्नी मिले सुन्दर और मेघावी बच्चे हों और जीवन खुशहाल हो किन्तु जीवन की आपाधापी में वह यह सब करके भी पत्नी से प्यार और बुढापे में बच्चों का साथ नहीं पाकर अकेला ही रह जाता है जबकि कोई गरीब परिवार की लड़की को ब्याह कर लाता है उसे शिक्षित बनाता है और जीवन के सारे सुख पाता है अपने कार्य पर सदैव दूसरों से प्रशंसा भी पा कर निहाल हो जाता है.सिर्फ एक सकारात्मक सोच होना चाहिए और खुद में वह क्षमता होना चाहिए की हर मुश्किल से समाज की चिंता किये बिना अपने लक्ष्य की और आगे बढ़ते ही रहे. बस इतना ही मै कहना चाह रहा था किन्तु शायद ठीक से कह नहीं पाया था.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: Sumit Sumit

मान्यवर सुमित जी, पहले तो आप अपने लेख के शब्दों पर गौर करें, जो आपने गधे और घोड़े वाली बात की है ........! क्या जब आप बूढ़े हो जायेंगे और आज के सामान आपके अन्दर ऊर्जा नहीं होगी तो आपकी इंसान की नस्ल बदल जायेगी ....? आप इंसान नहीं रहेंगे ? यदि आप इंसान ही रहेंगे तो बूढा घोडा गधा कैसे हो सकता है........ ! मुझे लगता है आपका क्रिकेट ज्ञान काफी कम है क्योंकि पिछले विदेशी दौरों पर कोहली के बाद सबसे ज्यादा रन बनाने वाले तेंदुलकर ही हैं और आपके जवान घोड़ों का प्रदर्शन गधों से भी बदतर था. गांगुली प्रदर्शन के आधार पर कम और अपने बडबोलेपन व् राजनीति के कारण बाहर हुए, द्रविड़ के ऊपर किसी का कोई दबाव नहीं था और वनडे से तो वो पहले ही संन्यास ले चुके थे.........! आपने हम लोगों से माफ़ी न भी मांगी होती तो इस से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जिसके ऊपर आपने ऊँगली उठाई उसके ऊपर भी ऐसे किसी कमेन्ट का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वैसे आपकी माफ़ी भी आपके दिए हुए तर्कों(कु) ने व्यर्थ कर दी है जरा फिर से अपने लेख पर गौर करें और फिर सोचें की आपने क्या लिखा है

के द्वारा: munish munish

सबसे पहले हर उस इंसान से माफ़ी चाहता हूँ, जिसे इस लेख से तकलीफ पोह्ची.........पहली बार मैंने किसी खास इंसान की तरफ इशारा किया, और जन आक्रोश का सामना करना पड़ा ......इसलिए मैं अपनी गलती मानते हुवे एक बार फिर माफ़ी चाहता हूँ.....मगर साथ में आप लोगो की बातों का जवाब भी देना चाहता हूँ ,,,,,, निशा जी मैं आपकी बात से सहमत हूँ , मगर सचिन विश्राम लेंगे कब,,,,जब उनका सुपुत्र अर्जुन भी क्रिकेट में आ जायेगा क्या तब ? अब मुनीश जी आप की बात भी सही है,, मगर जब सौरभ गांगुली काफी समय तक अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए तो उन पर दबाव डाला गया कि वो सन्यास ले ले ...परन्तु जब सचिन जी का प्रदर्शन खराब रहा तो उन्हें मोक्के पे मोक्के,,...बात कुछ हज़म नहीं हुयी......पीछे लगभग ६ महीनो से लगातार १५ -२० से ज्यादा और कभी कभी ५० के आस पास का प्रदर्शन, फिर भी टीम में जगह सही सलामत...........जब कि ऐसा ही प्रदर्शन करने वाले राहुल जी के साथ ...............बाकि आप मुझसे ज्यादा समझदार है ...............

के द्वारा: Sumit Sumit

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सुमित जी आपने वाकई तर्क्दार भाषा लिखी हें / नेता व् भिखारी में समानता सी लगती हें / एक वोट का भिखारी हें तो दुसरा नोट का / यानी नेता वोट से नोट बटोरता हें जबकि भिखारी केवल नोट से ही खुश हें / आपका ये कहना भी सही लगता की जिस प्रकार डॉक्टर का बेटा डॉक्टर , नेता का बेटा नेता व् भिखारी भी अपनी विरासत अपनी अगली पीढी को देकर जाना चाहता हें / आपने बीमारी में भी अच्छा लिखा हें / आप जल्दी स्वस्थ हों /दोनों प्रोफेशन आज अपनी उंचाई पर हें / दोनों धंधों में उम्र बदने पर आमदनी बढती हें / दोनों को उधो का लेना न माधो का देना हें / इनके दोनों को सावन हरे न भादों सूखे वाली बात हें / चुनाव का मोसम हें एक तरफ नेता जहां वादे की सोगात दे रहा हें वहीँ भिखारी दुवा की / ये बात भी सही हें के नेता व् भिखारी दोनों सेकुलर हें / दोनों ने जहां देखी तवा परात वहीँ गुजारी सारी रात वाली नीती अपना , अगड़ा पीचदा, दलित , हिन्दू मुसलमान यह्ना तक NRI को भी एक एक से देखना शुरू किया हें / भिखारी व् नेता लिंग भेद . जाती भेद में कोई भेदभाव नहीं करता / वाकई आपने बीमारी में भी देश के असली बीमारी के और इशारा कर दिया / आखिर आपने दो गिलहरी के चोंच लड़ाने का सिम्बल जो बनाया हें / जिस प्रकार नेता , भिखारी जात पात नहीं देखता उसी प्रकार वेलन ताईन दे पर एक प्रेमी भी भी तुच्छ चीजों से दूर रहता हें / बधाई अच्छा लिखने व् सोचने पर /

के द्वारा: satish3840 satish3840

के द्वारा: Sumit Sumit

मैंने आपसे अपने लेख में बार बार माफ़ी मांगी, मगर मुझे लगता है आपने माफ़ नहीं किया ...... अब मुझे पता चला की लोग आपकी कमेन्ट पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं करते ,,,,,अगर मैं आपकी साडी बातो का जवाब दे भी दू तो आप फिर कुछ पुच लेंगे ,,,,,और ये सिलसिला युही चलता रहेंगा ,,,,,,इसलिए मैं भी औरो की तरह आपसे हार मानता हूँ ,,,,,, एक बात और मैं इश्वर चंद विद्यासागर और विद्यासागर नौटियाल जी का नाम तो सुना है ,,,,मगर कभी विद्यासागर दिक्सित का नहीं .,,,,हलाकि मैं गूगल पे सर्च कर सकता था , मगर जिस चीज़ को मैं नहीं जानता, उसके बारे में झूठ तो नहीं बोलूँगा कम से कम.........वैसे एक विद्यासागर दिक्सित facebook पे तो है ,,,कही आप उनकी बात तो नहीं कर रहे ,,,,,,,,,

के द्वारा: Sumit Sumit

सुमित बाबु प्यार तो सभी जानवर करते हैं केवल गिलहरी नहीं लेकिन आदमी की पसंद न पसंद आदमी के विचारों और मन से होती है इसलिए आपने गिलहरी लगा दी ...... यकीन मानिए यदि आप शेर की तस्वीर लगाते तो मैं आपकी शक्ल शेर के सामान न समझकर, बहादुर मानता ...... आप बन्दर की लगाते मैं आपको चंचल समझता .... प्रकृति के हिसाब से अंदाजा लगाया जाता है अगर आप चाहते हैं की अंदाजे पे दुनिया न चले तो गिल्लू की जगह अपनी शक्ल लगा दीजिये अच्चा रहेगा ......... !आपने खुद स्वीकार किया की आप व्यंग लिखना चाहते थे और भटक गए....... फिर आप अपनी गलती को ठीक करने के लिए कहते हैं की श्रेणी से ज्यादा अपनी बात कहने में विश्वास रखते हैं, तो आपने ये क्यों लिखा की आप भटक गए .......! इसका अर्थ है की आप भी मानते हैं की कहीं कुछ गड़बड़ हुई शब्दों के चयन में ........ खैर आप अभी से भटकें नहीं, लेखन के क्षेत्र में बहुत उम्मीद हैं और उम्मीद है की आगे से आप इस भटकाव को रोकेंगे....... क्योंकि लेखन और साहित्य की द्रष्टि से इन श्रेणियों और साहित्यिक वर्जनाओं की बहुत उपयोगिता है. आप ने एक बच्चे का उदाहरण दिया ....... क्या आप ये बताएँगे की आप पर या किसी पर भी वो बच्चा विश्वास क्यों करे...... जबकि उसके सामने विश्वास का कारण कोई भी नहीं है जैसे अपने पडोसी के बच्चे को ही यदि कहें की में तुझे ज्यादा प्यार करूंगा, सारे खिलोने दूंगा, अच्छे कपडे दूंगा... बढ़िया खाना दूंगा पर तुम मेरे पास रहो ........ लेकिन शायद आपको मायूसी ही हाथ लगे वो आपके साथ रहने नहीं आ सकता........! विश्वास जगाने का एक उदाहरण देता हूँ शायद आपने विद्यासागर दीक्षित का नाम सुना हो एक बार वो काम से वापस लौट रहे थे और उसी दिन उन्हें वेतन मिला था, रास्ते में एक बूढी औरत मिली और उसने उन से भीख मांगते हुए कहा " बेटा एक पैसा दे दो बहुत भूख लगी है " दीक्षित जी दुखी हुए और बोले " की एक बेटे के रहते माँ कैसे भूखी रह सकती है और उन्होंने उनसे पुछा की आज का खाना तो तुम खा लोगी लेकिन कल क्या करोगी तो बूढी औरत ने कहा की भीख मांगकर ही गुजारा करूंगी .... तब दीक्षित जी ने कहा यदि में कल के पैसे भी दे दूं तब..... तो बूढी औरत ने कहा की फिर मैं कल भीख नहीं माँगूंगी..... तब दीक्षित जी ने कहा की आपको महीने में कितने पैसे चाहिए की भीख न मांगनी पड़े .... औरत ने अपनी आवश्यकता उन्हें बतायी और दीक्षित जी ने उसकी आवश्यकता पूरी की बाद में दीक्षित जी ने उसके योग्य कार्य करने की व्यवस्था उसके घर पर ही करवा दी ..... यानी पहले विश्वास जीता और फिर काम कराया.........! भिक्षव्रत्ति अभिशाप है लेकिन वो खाली भाषण बाज़ी से ख़त्म नहीं होगी......... अपनी ख़ुशी से कोई भिखारी नहीं बनता अब रही आदरणीय राजकमल जी के कमेन्ट की बात बहुत सी बातें जब तक समझ नहीं आतीं जब तक हम स्वयं करते हैं लेकिन जब दूसरों को करता देखते हैं तो उसका प्रभाव समझ में आता है ........! जैसे आपकी समझ तुरंत आ गया....... ! लेकिन आपने उसका सकारात्मक पक्ष समझने के स्थान पर नकारात्मक पक्ष देखा ...... !

के द्वारा: munish munish

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मैं हमेशा आपका प्रिय ही रहूँगा, क्युकी उम्र और तजुर्बे में आप मुझसे बड़े है.......... और अच्छा हुआ मैंने शेर या अन्य जानवर की फोटो नहीं लगायी ,वरना आप तो मुझे पता नहीं कैसा दिखने वाला समझते ,,,,,,,,,,,,,,वैसे ये फोटो ये बताती है की प्यार सिर्फ इंसान ही नहीं जानवर भी करते है ....... जब मैंने लिखना सुरु किया था तो ये व्यंग ही था, मगर आगे आके थोडा सा मैं भटक गया,,,,,मगर मैं श्रेणी से ज्यादा अपनी बात सबके सामने रखने में विश्वास रखता हूँ,,,,,, भिक्षा वृत्ति समाज के लिए अबिशाप है ,,,,मगर आप एक बार किसी छोटे बच्चे को आपने साथ चलने और उसको पढ़ते के लिए या किसी अन्य काम करने को कहे ,,,,,उनका हमेशा उल्टा जवाब होगा .....यानि के वो खुश है इस काम से .......] जैसा परदीप जी ने लिखा है कि भिखारी तो सभी है बस जगह जगह का फर्क है ,,,,बाकि आप समझ ही गए होंगे ,,,,,,, राजकमल जी कि कमेन्ट थी : "आप आम नहीं बल्कि खास हो खुद में इसलिए कमेन्ट भिखारी की तरह नहीं शहंशाहो की तरह लिया करे"!! और आखरी में खुद अपना लिंक डाल दिया ,,,,,, अब मुझे आप ही समझा दो कि अगर शहंशाह भी भीख ही मांगेगा तो अंतर क्या रहा दोनों में , नाम के सिवा ........

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प्रिय सुमित बाबु, वो आदरणीय की जगह प्रिय इसलिए लिखा की आपकी फोटो की जगह प्यारी सी छोटी सी गिलहरी है तो मैंने सोचा आप भी अभी उम्र में छोटे ही होगे और शक्ल भी गिलहरी की तरह क्यूट ही होगी तो अगर मेरा आकलन गलत हो तो प्रिय के स्थान पर आदरणीय पढ़ लेना मैंने सोचा जब आपको मेरी तरह इस छोटी सी उम्र में रोग लग ही गया है तो क्यों न कुछ इलाज ही किया जाए पहले आपके लेख पर आते हैं. आपने बहुत मेहनत करके ये लेख लिखा पर जैसा की आदरणीय निशा जी ने पूछा की ये किस श्रेणी में आता है या इसको क्या कहेंगे ....... कृपया स्पष्ट करें क्योंकि लेखन के क्षेत्र में या बहुत ज़रूरी है की आप ये बता सकें की आप हमें क्या पढ़ा रहे हैं....... ये व्यंग है तो किस पर है.......? क्या भिखारियों का मज़ाक उड़ाया गया है या आज़ादी के ६० साल बाद भी हमारी सोच एक मृत के सामान है यह अहसास कराया गया है इस विषय में सोचकर बताइयेगा ........... ! भिक्षा वृत्ति हमारे समाज में एक अभीशाप है तो क्या ये समाज का चित्रण है कृपया स्पष्ट करें क्योंकि मेरे सामान अभी से उल्टा सीधा सोचेंगे तो जीवन कैसे चलेगा ......... वैसे भिखारी कोई अपनी ख़ुशी से नहीं बनता .... न ही भिकारी बनकर किसी को कोई आनंद प्राप्त होता है इस सन्दर्भ में रहीम दास जी का दोहा शायद काफी होगा रहिमन वे नर मर चुके जो कहूँ मांगन जाएँ पर उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाएँ खैर ..... आदरणीय राजकमल जी ने तमन्ना जी के लेख पर आपके दिए हुए कमेन्ट के नीचे अपना कमेन्ट दिया कृपया उसे अवश्य पढें ..........

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प्रिय सुमित जी, आपने बहुत ही संजीदा विषय उठाया है। इस पर कोई सपोर्ट या विरोध नहीं हो सकता। मेरा अपना विचार है कि पति-पत्नी को अलग -अलग करके ना देखिये। शादी एक अघोषित समझौता होता है जिसमें दोनों को कुछ खोना और कुछ पाना होता है। अगर प्रेमिका के सौ जुल्मों को भी कोई भूले से भी नहीं उठता, तो फिर बीबी से तकलीफ कैसी? आपने वो कविता तो पढ़ी होगी: "इस पार प्रिए तुम हो मधु है। उस पार पता है क्या होगा? तेरा बाप मिलेगा बृक्ष तले, जो हाथ लिए जूता होगा।" प्रेमिका के बाप के जूते से तो अच्छा ही है..... मेरी आपको एक सलाह है कि पहले आप शादी करो फिर देखते हैं। आप इन बातों से डरकर शादी का इरादा मत छोड़िएगा। हम बाकी बेचारे आपके साथ हैं।

के द्वारा: manojjohny manojjohny

के द्वारा: Sumit Sumit

सुमित जी, नमस्कार! आपकी रचना और आपके मित्र की करुण गाथा पढी, मजा आया! यही कहना पढ़ेगा... लगता है आपकी इस रचना को मुनीश बाबु ने नहीं पढ़ी है, नहीं तो वे आपका नैतिक और न्यायायिक समर्थन देते..... मेरे परम मित्र गजोधर भाई, जरा पुराने ख्याल के है. उन्होंने पत्नी को खुश करने के लिए एक स्वरचित वंदना का आविष्कार किया और प्रतिदिन सुबह शाम अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए वंदन सुनते हैं-- जिनकी कुछ पक्तियां जो मुझे याद है आपको शेयर कर रहा हूँ. तूही मेरी गंगा हो, तुही मेरी यमुना, तुही सरस्वती हो, तुही गोमती हो! बहुत बक चुकी हो, तुम्हे मैं सुला दूं, पवन छेड़े सरगम मैं लोड़ी सुना दूं. तुमे देखकर मुझको ख्याल आ रहा है, बॉस मेरी तुम हो, तुम्ही सम्मति हो! तुही मेरी .....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सुमित नेथानी जी आप की रचना पढी व् पाठकों की प्रतिकिर्या पढी बहुत मन को छू गयी / पति पत्नी में कोई भी बेचारा नहीं दोनों एक साथ चलने वाले हें / जहां प्यार होगा तो लड़ाई तो होगी ही , प्यार के साथ साथ दोनों में त्याग भी होता हें / पड़ी क्यों की परिवार का मुखिया हे तो उसका त्याग ज्यादा दिखाई देता हें / पानी परिवार की बेल को आगे बढाती हे , पुरे परिवार का ध्यान रखती हे तो उसका गरजना शायद ही किसी को बुरा लगता हें / मेरी शादी को अगले साल पच्चीस साल हो जायेंगे / में और मेरी श्रीमती जी न जाने कब झगड़ पड़े पता ही नहीं / परन्तु जब वो मुझसे कुछ दिन के लिए दूर चली जाती हे तो भूख न जाने चली जाती हे / वास्तव में पति पत्नी के बीच लड़ाई एक संबध को प्रगाढ़ करती हे / मुझे याद हे मेरी बीमारी के समय जब उसने मेरी दिन रात सेवा की / दिल के दोरे के समय वास्तव में उसने दिन रात एक कर दिया / इस लिए न नारी बेचारी हे न नर दोनों का अपना अपना रोल हे / यूँ मजाक व्यंग्य में हम कुछ भी कह ले परन्तु दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे हें / यं मान लीजीये भारत में पति पत्नी का रिश्ता प्रधानमंत्री व् रास्ट्र पति सा हे / खैर जो भी हो आपकी रचना वाकई अच्छी हे / भगवान् करे आप आप न रहें व् हम हो जाएँ / खूब गुजरेगी जब मिल बैठेगें दीवाने दो /

के द्वारा: satish3840 satish3840

के द्वारा: Sumit Sumit

निजी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है। इस रिश्ते की डोर में ही परिवार के सारे रिश्ते पिरोए होते हैं। अगर ये धागा टूट जाए तो समझिए परिवार बिखरने में देर नहीं लगेगी। अगर परिवार को सहेजकर रखना चाहते हैं तो अपने दाम्पत्य को दिव्य बनाइए। आज के दौर में दो तरह के दाम्पत्य चल रहे हैं, एक असंतुष्ट और दूसरा अशांत। कहीं संसाधनों को जुटाने में दाम्पत्य दांव पर लगाया जा रहा है तो कहीं विश्वास के अभाव में गृहस्थी की बलि चढ़ाई जा रही है। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ प्रेम और विश्वास इन दो पहियों पर चलता है। एक भी पहिया डगमगाया तो रिश्ते का पतन तय है। आजकल युवा दम्पत्तियों में एक शिकायत आम है कि आपस में बात नहीं हो पाती। दोनों के बीच कोई अनदेखी सी दीवार खड़ी है। यहीं से प्रेम के कम होने और भरोसे के डिगने का क्रम शुरू होता है। अपने रिश्ते को प्रेम से सिंचिए। कई रिश्ते केवल शब्दों पर टिके होते हैं, शब्दों का आधार हटते ही गिर जाते हैं। बातचीत कम हुई कि रिश्ते में दुराव शुरू हो जाता है। जबकि अगर रिश्ते में प्रेम हो तो शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। बिन कहे, बिन सुने बात हो जाती है। रामचरितमानस में राम सीता का दाम्पत्य ऐसा ही था। ना शब्द थे, न कोई बात, बस भावों से ही एक-दूसरे को समझ जाते। वनवास में जब राम, सीता और लक्ष्मण को केवट ने गंगा के पार उतारा तो राम के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। वे इधर -उधर कुछ देख रहे थे। तभी तुलसीदास ने लिखा है पिय हिय की सिय जान निहारी, मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। अर्थात सीता ने बिना राम के कहे, सिर्फ उनके हाव-भाव देखकर ही समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देने के लिए कोई वस्तु ढूंढ़ रहे हैं और उन्होंने अंगुली से अंगुठी उतार कर दे दी। निजी संबंधों में प्रेम ऐसा हो कि शब्दों के बगैर भी बात हो जाए। वो ही रिश्ता सफल भी है और सुखी भी।

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