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Main Aur Meri Tanhai

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Sumit


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हिंदुस्तान Vs इंडिया

Posted On: 18 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

17 Comments

प्यार का मौसम

Posted On: 12 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

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आम आदमी और भिखारी

Posted On: 31 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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एक अनोखा पत्र

Posted On: 24 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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नारी और बेचारा पुरुष (पति देव )

Posted On: 19 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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2025 का बॉलीवुड

Posted On: 12 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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पव्वे की महिमा

Posted On: 5 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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मैं और तू

Posted On: 3 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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ऐसे इंसान को क्या कहेंगे

Posted On: 3 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

4 Comments

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सुमित जी आपने वाकई तर्क्दार भाषा लिखी हें / नेता व् भिखारी में समानता सी लगती हें / एक वोट का भिखारी हें तो दुसरा नोट का / यानी नेता वोट से नोट बटोरता हें जबकि भिखारी केवल नोट से ही खुश हें / आपका ये कहना भी सही लगता की जिस प्रकार डॉक्टर का बेटा डॉक्टर , नेता का बेटा नेता व् भिखारी भी अपनी विरासत अपनी अगली पीढी को देकर जाना चाहता हें / आपने बीमारी में भी अच्छा लिखा हें / आप जल्दी स्वस्थ हों /दोनों प्रोफेशन आज अपनी उंचाई पर हें / दोनों धंधों में उम्र बदने पर आमदनी बढती हें / दोनों को उधो का लेना न माधो का देना हें / इनके दोनों को सावन हरे न भादों सूखे वाली बात हें / चुनाव का मोसम हें एक तरफ नेता जहां वादे की सोगात दे रहा हें वहीँ भिखारी दुवा की / ये बात भी सही हें के नेता व् भिखारी दोनों सेकुलर हें / दोनों ने जहां देखी तवा परात वहीँ गुजारी सारी रात वाली नीती अपना , अगड़ा पीचदा, दलित , हिन्दू मुसलमान यह्ना तक NRI को भी एक एक से देखना शुरू किया हें / भिखारी व् नेता लिंग भेद . जाती भेद में कोई भेदभाव नहीं करता / वाकई आपने बीमारी में भी देश के असली बीमारी के और इशारा कर दिया / आखिर आपने दो गिलहरी के चोंच लड़ाने का सिम्बल जो बनाया हें / जिस प्रकार नेता , भिखारी जात पात नहीं देखता उसी प्रकार वेलन ताईन दे पर एक प्रेमी भी भी तुच्छ चीजों से दूर रहता हें / बधाई अच्छा लिखने व् सोचने पर /

के द्वारा: satish3840

मैंने आपसे अपने लेख में बार बार माफ़ी मांगी, मगर मुझे लगता है आपने माफ़ नहीं किया ...... अब मुझे पता चला की लोग आपकी कमेन्ट पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं करते ,,,,,अगर मैं आपकी साडी बातो का जवाब दे भी दू तो आप फिर कुछ पुच लेंगे ,,,,,और ये सिलसिला युही चलता रहेंगा ,,,,,,इसलिए मैं भी औरो की तरह आपसे हार मानता हूँ ,,,,,, एक बात और मैं इश्वर चंद विद्यासागर और विद्यासागर नौटियाल जी का नाम तो सुना है ,,,,मगर कभी विद्यासागर दिक्सित का नहीं .,,,,हलाकि मैं गूगल पे सर्च कर सकता था , मगर जिस चीज़ को मैं नहीं जानता, उसके बारे में झूठ तो नहीं बोलूँगा कम से कम.........वैसे एक विद्यासागर दिक्सित facebook पे तो है ,,,कही आप उनकी बात तो नहीं कर रहे ,,,,,,,,,

के द्वारा: Sumit

सुमित बाबु प्यार तो सभी जानवर करते हैं केवल गिलहरी नहीं लेकिन आदमी की पसंद न पसंद आदमी के विचारों और मन से होती है इसलिए आपने गिलहरी लगा दी ...... यकीन मानिए यदि आप शेर की तस्वीर लगाते तो मैं आपकी शक्ल शेर के सामान न समझकर, बहादुर मानता ...... आप बन्दर की लगाते मैं आपको चंचल समझता .... प्रकृति के हिसाब से अंदाजा लगाया जाता है अगर आप चाहते हैं की अंदाजे पे दुनिया न चले तो गिल्लू की जगह अपनी शक्ल लगा दीजिये अच्चा रहेगा ......... !आपने खुद स्वीकार किया की आप व्यंग लिखना चाहते थे और भटक गए....... फिर आप अपनी गलती को ठीक करने के लिए कहते हैं की श्रेणी से ज्यादा अपनी बात कहने में विश्वास रखते हैं, तो आपने ये क्यों लिखा की आप भटक गए .......! इसका अर्थ है की आप भी मानते हैं की कहीं कुछ गड़बड़ हुई शब्दों के चयन में ........ खैर आप अभी से भटकें नहीं, लेखन के क्षेत्र में बहुत उम्मीद हैं और उम्मीद है की आगे से आप इस भटकाव को रोकेंगे....... क्योंकि लेखन और साहित्य की द्रष्टि से इन श्रेणियों और साहित्यिक वर्जनाओं की बहुत उपयोगिता है. आप ने एक बच्चे का उदाहरण दिया ....... क्या आप ये बताएँगे की आप पर या किसी पर भी वो बच्चा विश्वास क्यों करे...... जबकि उसके सामने विश्वास का कारण कोई भी नहीं है जैसे अपने पडोसी के बच्चे को ही यदि कहें की में तुझे ज्यादा प्यार करूंगा, सारे खिलोने दूंगा, अच्छे कपडे दूंगा... बढ़िया खाना दूंगा पर तुम मेरे पास रहो ........ लेकिन शायद आपको मायूसी ही हाथ लगे वो आपके साथ रहने नहीं आ सकता........! विश्वास जगाने का एक उदाहरण देता हूँ शायद आपने विद्यासागर दीक्षित का नाम सुना हो एक बार वो काम से वापस लौट रहे थे और उसी दिन उन्हें वेतन मिला था, रास्ते में एक बूढी औरत मिली और उसने उन से भीख मांगते हुए कहा " बेटा एक पैसा दे दो बहुत भूख लगी है " दीक्षित जी दुखी हुए और बोले " की एक बेटे के रहते माँ कैसे भूखी रह सकती है और उन्होंने उनसे पुछा की आज का खाना तो तुम खा लोगी लेकिन कल क्या करोगी तो बूढी औरत ने कहा की भीख मांगकर ही गुजारा करूंगी .... तब दीक्षित जी ने कहा यदि में कल के पैसे भी दे दूं तब..... तो बूढी औरत ने कहा की फिर मैं कल भीख नहीं माँगूंगी..... तब दीक्षित जी ने कहा की आपको महीने में कितने पैसे चाहिए की भीख न मांगनी पड़े .... औरत ने अपनी आवश्यकता उन्हें बतायी और दीक्षित जी ने उसकी आवश्यकता पूरी की बाद में दीक्षित जी ने उसके योग्य कार्य करने की व्यवस्था उसके घर पर ही करवा दी ..... यानी पहले विश्वास जीता और फिर काम कराया.........! भिक्षव्रत्ति अभिशाप है लेकिन वो खाली भाषण बाज़ी से ख़त्म नहीं होगी......... अपनी ख़ुशी से कोई भिखारी नहीं बनता अब रही आदरणीय राजकमल जी के कमेन्ट की बात बहुत सी बातें जब तक समझ नहीं आतीं जब तक हम स्वयं करते हैं लेकिन जब दूसरों को करता देखते हैं तो उसका प्रभाव समझ में आता है ........! जैसे आपकी समझ तुरंत आ गया....... ! लेकिन आपने उसका सकारात्मक पक्ष समझने के स्थान पर नकारात्मक पक्ष देखा ...... !

के द्वारा: munish

के द्वारा: Sumit

मैं हमेशा आपका प्रिय ही रहूँगा, क्युकी उम्र और तजुर्बे में आप मुझसे बड़े है.......... और अच्छा हुआ मैंने शेर या अन्य जानवर की फोटो नहीं लगायी ,वरना आप तो मुझे पता नहीं कैसा दिखने वाला समझते ,,,,,,,,,,,,,,वैसे ये फोटो ये बताती है की प्यार सिर्फ इंसान ही नहीं जानवर भी करते है ....... जब मैंने लिखना सुरु किया था तो ये व्यंग ही था, मगर आगे आके थोडा सा मैं भटक गया,,,,,मगर मैं श्रेणी से ज्यादा अपनी बात सबके सामने रखने में विश्वास रखता हूँ,,,,,, भिक्षा वृत्ति समाज के लिए अबिशाप है ,,,,मगर आप एक बार किसी छोटे बच्चे को आपने साथ चलने और उसको पढ़ते के लिए या किसी अन्य काम करने को कहे ,,,,,उनका हमेशा उल्टा जवाब होगा .....यानि के वो खुश है इस काम से .......] जैसा परदीप जी ने लिखा है कि भिखारी तो सभी है बस जगह जगह का फर्क है ,,,,बाकि आप समझ ही गए होंगे ,,,,,,, राजकमल जी कि कमेन्ट थी : "आप आम नहीं बल्कि खास हो खुद में इसलिए कमेन्ट भिखारी की तरह नहीं शहंशाहो की तरह लिया करे"!! और आखरी में खुद अपना लिंक डाल दिया ,,,,,, अब मुझे आप ही समझा दो कि अगर शहंशाह भी भीख ही मांगेगा तो अंतर क्या रहा दोनों में , नाम के सिवा ........

के द्वारा: Sumit

प्रिय सुमित बाबु, वो आदरणीय की जगह प्रिय इसलिए लिखा की आपकी फोटो की जगह प्यारी सी छोटी सी गिलहरी है तो मैंने सोचा आप भी अभी उम्र में छोटे ही होगे और शक्ल भी गिलहरी की तरह क्यूट ही होगी तो अगर मेरा आकलन गलत हो तो प्रिय के स्थान पर आदरणीय पढ़ लेना मैंने सोचा जब आपको मेरी तरह इस छोटी सी उम्र में रोग लग ही गया है तो क्यों न कुछ इलाज ही किया जाए पहले आपके लेख पर आते हैं. आपने बहुत मेहनत करके ये लेख लिखा पर जैसा की आदरणीय निशा जी ने पूछा की ये किस श्रेणी में आता है या इसको क्या कहेंगे ....... कृपया स्पष्ट करें क्योंकि लेखन के क्षेत्र में या बहुत ज़रूरी है की आप ये बता सकें की आप हमें क्या पढ़ा रहे हैं....... ये व्यंग है तो किस पर है.......? क्या भिखारियों का मज़ाक उड़ाया गया है या आज़ादी के ६० साल बाद भी हमारी सोच एक मृत के सामान है यह अहसास कराया गया है इस विषय में सोचकर बताइयेगा ........... ! भिक्षा वृत्ति हमारे समाज में एक अभीशाप है तो क्या ये समाज का चित्रण है कृपया स्पष्ट करें क्योंकि मेरे सामान अभी से उल्टा सीधा सोचेंगे तो जीवन कैसे चलेगा ......... वैसे भिखारी कोई अपनी ख़ुशी से नहीं बनता .... न ही भिकारी बनकर किसी को कोई आनंद प्राप्त होता है इस सन्दर्भ में रहीम दास जी का दोहा शायद काफी होगा रहिमन वे नर मर चुके जो कहूँ मांगन जाएँ पर उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाएँ खैर ..... आदरणीय राजकमल जी ने तमन्ना जी के लेख पर आपके दिए हुए कमेन्ट के नीचे अपना कमेन्ट दिया कृपया उसे अवश्य पढें ..........

के द्वारा: munish

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

के द्वारा: Sumit

प्रिय सुमित जी, आपने बहुत ही संजीदा विषय उठाया है। इस पर कोई सपोर्ट या विरोध नहीं हो सकता। मेरा अपना विचार है कि पति-पत्नी को अलग -अलग करके ना देखिये। शादी एक अघोषित समझौता होता है जिसमें दोनों को कुछ खोना और कुछ पाना होता है। अगर प्रेमिका के सौ जुल्मों को भी कोई भूले से भी नहीं उठता, तो फिर बीबी से तकलीफ कैसी? आपने वो कविता तो पढ़ी होगी: "इस पार प्रिए तुम हो मधु है। उस पार पता है क्या होगा? तेरा बाप मिलेगा बृक्ष तले, जो हाथ लिए जूता होगा।" प्रेमिका के बाप के जूते से तो अच्छा ही है..... मेरी आपको एक सलाह है कि पहले आप शादी करो फिर देखते हैं। आप इन बातों से डरकर शादी का इरादा मत छोड़िएगा। हम बाकी बेचारे आपके साथ हैं।

के द्वारा: manojjohny

के द्वारा: Sumit

सुमित जी, नमस्कार! आपकी रचना और आपके मित्र की करुण गाथा पढी, मजा आया! यही कहना पढ़ेगा... लगता है आपकी इस रचना को मुनीश बाबु ने नहीं पढ़ी है, नहीं तो वे आपका नैतिक और न्यायायिक समर्थन देते..... मेरे परम मित्र गजोधर भाई, जरा पुराने ख्याल के है. उन्होंने पत्नी को खुश करने के लिए एक स्वरचित वंदना का आविष्कार किया और प्रतिदिन सुबह शाम अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए वंदन सुनते हैं-- जिनकी कुछ पक्तियां जो मुझे याद है आपको शेयर कर रहा हूँ. तूही मेरी गंगा हो, तुही मेरी यमुना, तुही सरस्वती हो, तुही गोमती हो! बहुत बक चुकी हो, तुम्हे मैं सुला दूं, पवन छेड़े सरगम मैं लोड़ी सुना दूं. तुमे देखकर मुझको ख्याल आ रहा है, बॉस मेरी तुम हो, तुम्ही सम्मति हो! तुही मेरी .....

के द्वारा: jlsingh

सुमित नेथानी जी आप की रचना पढी व् पाठकों की प्रतिकिर्या पढी बहुत मन को छू गयी / पति पत्नी में कोई भी बेचारा नहीं दोनों एक साथ चलने वाले हें / जहां प्यार होगा तो लड़ाई तो होगी ही , प्यार के साथ साथ दोनों में त्याग भी होता हें / पड़ी क्यों की परिवार का मुखिया हे तो उसका त्याग ज्यादा दिखाई देता हें / पानी परिवार की बेल को आगे बढाती हे , पुरे परिवार का ध्यान रखती हे तो उसका गरजना शायद ही किसी को बुरा लगता हें / मेरी शादी को अगले साल पच्चीस साल हो जायेंगे / में और मेरी श्रीमती जी न जाने कब झगड़ पड़े पता ही नहीं / परन्तु जब वो मुझसे कुछ दिन के लिए दूर चली जाती हे तो भूख न जाने चली जाती हे / वास्तव में पति पत्नी के बीच लड़ाई एक संबध को प्रगाढ़ करती हे / मुझे याद हे मेरी बीमारी के समय जब उसने मेरी दिन रात सेवा की / दिल के दोरे के समय वास्तव में उसने दिन रात एक कर दिया / इस लिए न नारी बेचारी हे न नर दोनों का अपना अपना रोल हे / यूँ मजाक व्यंग्य में हम कुछ भी कह ले परन्तु दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे हें / यं मान लीजीये भारत में पति पत्नी का रिश्ता प्रधानमंत्री व् रास्ट्र पति सा हे / खैर जो भी हो आपकी रचना वाकई अच्छी हे / भगवान् करे आप आप न रहें व् हम हो जाएँ / खूब गुजरेगी जब मिल बैठेगें दीवाने दो /

के द्वारा: satish3840

के द्वारा: Sumit

निजी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है। इस रिश्ते की डोर में ही परिवार के सारे रिश्ते पिरोए होते हैं। अगर ये धागा टूट जाए तो समझिए परिवार बिखरने में देर नहीं लगेगी। अगर परिवार को सहेजकर रखना चाहते हैं तो अपने दाम्पत्य को दिव्य बनाइए। आज के दौर में दो तरह के दाम्पत्य चल रहे हैं, एक असंतुष्ट और दूसरा अशांत। कहीं संसाधनों को जुटाने में दाम्पत्य दांव पर लगाया जा रहा है तो कहीं विश्वास के अभाव में गृहस्थी की बलि चढ़ाई जा रही है। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ प्रेम और विश्वास इन दो पहियों पर चलता है। एक भी पहिया डगमगाया तो रिश्ते का पतन तय है। आजकल युवा दम्पत्तियों में एक शिकायत आम है कि आपस में बात नहीं हो पाती। दोनों के बीच कोई अनदेखी सी दीवार खड़ी है। यहीं से प्रेम के कम होने और भरोसे के डिगने का क्रम शुरू होता है। अपने रिश्ते को प्रेम से सिंचिए। कई रिश्ते केवल शब्दों पर टिके होते हैं, शब्दों का आधार हटते ही गिर जाते हैं। बातचीत कम हुई कि रिश्ते में दुराव शुरू हो जाता है। जबकि अगर रिश्ते में प्रेम हो तो शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। बिन कहे, बिन सुने बात हो जाती है। रामचरितमानस में राम सीता का दाम्पत्य ऐसा ही था। ना शब्द थे, न कोई बात, बस भावों से ही एक-दूसरे को समझ जाते। वनवास में जब राम, सीता और लक्ष्मण को केवट ने गंगा के पार उतारा तो राम के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। वे इधर -उधर कुछ देख रहे थे। तभी तुलसीदास ने लिखा है पिय हिय की सिय जान निहारी, मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। अर्थात सीता ने बिना राम के कहे, सिर्फ उनके हाव-भाव देखकर ही समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देने के लिए कोई वस्तु ढूंढ़ रहे हैं और उन्होंने अंगुली से अंगुठी उतार कर दे दी। निजी संबंधों में प्रेम ऐसा हो कि शब्दों के बगैर भी बात हो जाए। वो ही रिश्ता सफल भी है और सुखी भी।

के द्वारा: D33P

के द्वारा: Sumit

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