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नारी और बेचारा पुरुष (पति देव )

पोस्टेड ओन: 19 Jan, 2012 जनरल डब्बा में

नारी के चरित्र को समझना बहुत मुश्किल है ! वो कभी ममता से भरी है तो कभी विकराल, वो कभी सावन का महीना है, तो कभी शरीर को जला देने वाली धूप की तरह ! नारी चरित्र को समझना बिल्कुल ऐसा है, जैसा किसी खजूर के पेड़ से छाया की उमीद करना ! वैसे हमारे देश में इंदिरा गाँधी, कल्पना चावला,  जैसी महान नारियो ने जन्म लिया है ! मगर इस वक़्त मेरा विषय  अलग है!

अक्सर मैं कुछ लेखिकाओ की रचना पढता हूँ, तो लगता है कि समाज में सबसे ज्यादा बुरा, घटिया और बेईज्ज़त प्राणी पुरुष ही है ( जानवर भी शायद उसे अच्छे हो )! होने वाली हर घटना का जिम्मेवार पुरुष को ही माना जाता है …….

तो इस बार नारी के उन गुणों पर नज़र डाली जाये, जिन्हें अक्सर लोग नज़रंदाज़ कर देते है -

नारी जो काम सबसे अच्छा कर सकती है, वो है – अपनी बात मनवाना ! चाहे वो तरीका कैकेयी का हो या सावित्री का ! जब तक उनकी बात पूर्ण ना हो जाए वो किसी यमदूत की तरह सर पर सवार रहती है !

पुरुष हमेशा गुलाम रहता है, कभी माँ का, कभी बीवी का, तो कभी प्रेमिका का ……………माँ दूध का वास्ता दे कर पुरुष को रोकती है, तो पत्नी ७ फेरो का और प्रेमिका सच्चे प्यार का …………..ज़िन्दगी भर पुरुष इन्ही वास्तो से जुजता रहता है ………………

पुरुष हमेशा अपनी सारी कमाई एक औरत के हाथ में ही रखता है ………

अगर नारी  (पत्नी) अनपढ़ भी हो तो कोई फर्क नहीं पढता, मगर पुरुष (पति) हमेशा पढ़ा लिखा होना चहिये,, वरना वो धरती पे बोझ, अन्न का दुश्मन आदि आदि !!!!!!!!!

बाल्यावस्था बहुत अच्छी होती है, युवावस्था मौज मस्ती की परन्तु पतिअवस्था एक ऐसी अवस्था होती है जिसमे पति की वो हालत होती है जो बहुत ही सोचनिए होती है!!!!!!

मेरे एक कवि मित्र ने तो कविता भी लिख दी, बेचारे  पुरुषो के ऊपर :

ऑफिस में बॉस की फटकार………..

घर में बीवी की मार ………

मतलब में बच्चे बोले लव यू पापा

वरना वो भी कहे आप हो बेकार …….

चारो तरफ हाहाकार

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा  ……………

माँ की सुने तो बीवी नाराज़…..

बीवी की सुने तो माँ नाराज़ ………

दोनों की सुने तो बच्चे नाराज़,,,

चारो तरफ हाहाकार

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा  ………..

किसी को नज़र उठा के देख ले….

तो बीवी का गुस्सा तैयार….

शाम को मार खा के भी हसना पड़े….

चारो तरफ हाहाकार

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा  ………..

पति से ज्यादा कुत्ते को करे प्यार…..

वाह री किस्मत ……..

पुरुष से तो कुत्ता बेहतर …………

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा  ………..

हाथ उठाए तो अत्याचारी

चुप रहना उसकी लाचारी

सहमा सहमा सा फिरता है वो

अपने ही घर में

चारो तरफ हाहाकार

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा  ……………

मुझे अपने मित्र की ये कविता बहुत अच्छी लगी ! शायद ये पुरुषो के जीवन का सच भी हो ! बेचारा पुरुष ( पति) अपने ही घर में कैदी की तरह रहता है………..


देवो ने भी नारी रूप के आगे घुटने टेके है….नारी हमेशा पुरुषो को सताती, रुलाती आई है ……

अभी तो मैं इस खुशी ( क्युकी इसे गम कह कर मैं नारी समाज से पंगा नहीं ले सकता) से वंचित हु, मगर कुछ सालो बाद मेरा भी यही हाल होने वाला है !


अब आप खुद ही सोचो इस समाज में बेचारा कौन ? नारी या पुरुष ……..बेचारा पुरुष ( पति )


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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jagobhaijago के द्वारा
February 9, 2012

महोदय,
म्रेरे विचार से आज के समय न तो नारी बेचारी है और न ही इतना सबल हो पायी है कि पुरुषों को इतना दबा सके जितना कि कविता का निहितार्थ है क्योंकि अच्छाई कभी बुराई से बडी नहीं हो सकती है। वैसे भी मा की ममता के,पत्नी या प्रेमिका के सच्चे प्रेम के सामने नारी के अवगुण तुच्छ हैं फिर भी मैं आपके विचारों से डरते डरते सहमत हो सकता हू क्यों कि तुलसी दास ने भी लिखा है कि अवगुण आठ सदा उर रहहीं

    Sumit के द्वारा
    February 9, 2012

    धन्यवाद सहमति के लिए

yogi sarswat के द्वारा
February 2, 2012

पुरुष से तो कुत्ता बेहतर …………

बेचारा पुरुष, जाये तो जाये कहा ………..

हाथ उठाए तो अत्याचारी

चुप रहना उसकी लाचारी

सहमा सहमा सा फिरता है वो

अपने ही घर में

चारो तरफ हाहाकार

कितना बुरा हाल दिखा दिया पुरुष का सुमित जी , आपने ! इतना बुरा हाल राम राम !

http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/30/

    Sumit के द्वारा
    February 2, 2012

    हाल तो इसे भी बुरा है ,,,,मगर मैं ज्यादा बुराई किसी चीज़ की नहीं करता …..

akraktale के द्वारा
January 27, 2012

सुमित जी,
आपको लगता है की इन महिलाओं को समझना आसान नहीं है और मुझे लगता है की मै इन्हें अच्छे से समझने लगा हूँ. चलो आपकी भी होगी है आप भी समझ जायेंगे जब शाम को दफ्तर से घर आने पर कई बार काल बेल बजाने पर भी दरवाजा नहीं खुलेगा और वेतन के दिन आपको काल बेल बजाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. साधुवाद.

    Sumit के द्वारा
    January 31, 2012

    बहुत खूब कहा …..

manojjohny के द्वारा
January 23, 2012

प्रिय सुमित जी, आपने बहुत ही संजीदा विषय उठाया है। इस पर कोई सपोर्ट या विरोध नहीं हो सकता। मेरा अपना विचार है कि पति-पत्नी को अलग -अलग करके ना देखिये। शादी एक अघोषित समझौता होता है जिसमें दोनों को कुछ खोना और कुछ पाना होता है। अगर प्रेमिका के सौ जुल्मों को भी कोई भूले से भी नहीं उठता, तो फिर बीबी से तकलीफ कैसी? आपने वो कविता तो पढ़ी होगी: “इस पार प्रिए तुम हो मधु है। उस पार पता है क्या होगा? तेरा बाप मिलेगा बृक्ष तले, जो हाथ लिए जूता होगा।” प्रेमिका के बाप के जूते से तो अच्छा ही है….. मेरी आपको एक सलाह है कि पहले आप शादी करो फिर देखते हैं। आप इन बातों से डरकर शादी का इरादा मत छोड़िएगा। हम बाकी बेचारे आपके साथ हैं।

    Sumit के द्वारा
    January 23, 2012

    मेरे लिए अभी कुछ साल तो इस खुशी से वंचित रहना पड़ेगा .,….

Lahar के द्वारा
January 23, 2012

प्रिय सुमित जी सप्रेम नमस्कार
नारी को तो कोई नहीं समझ सका है |
अच्छे व्यंग और अच्छे आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई |

    Sumit के द्वारा
    January 23, 2012

    धन्यवाद …..

jlsingh के द्वारा
January 21, 2012

सुमित जी, नमस्कार!
आपकी रचना और आपके मित्र की करुण गाथा पढी, मजा आया! यही कहना पढ़ेगा…
लगता है आपकी इस रचना को मुनीश बाबु ने नहीं पढ़ी है, नहीं तो वे आपका नैतिक और न्यायायिक समर्थन देते…..
मेरे परम मित्र गजोधर भाई, जरा पुराने ख्याल के है. उन्होंने पत्नी को खुश करने के लिए एक स्वरचित वंदना का आविष्कार किया और प्रतिदिन सुबह शाम अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए वंदन सुनते हैं– जिनकी कुछ पक्तियां जो मुझे याद है आपको शेयर कर रहा हूँ.
तूही मेरी गंगा हो, तुही मेरी यमुना, तुही सरस्वती हो, तुही गोमती हो!
बहुत बक चुकी हो, तुम्हे मैं सुला दूं, पवन छेड़े सरगम मैं लोड़ी सुना दूं.
तुमे देखकर मुझको ख्याल आ रहा है, बॉस मेरी तुम हो, तुम्ही सम्मति हो! तुही मेरी …..

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    धन्यवाद ………..

vinitashukla के द्वारा
January 21, 2012

सुमित जी, यदि वाकई कोई ऐसा पुरुष है( कविता में वर्णित पुरुष जैसा) तो अवश्य वह सहानुभूति का पात्र है. हास्य व्यंग्य के रंग बिखेरती इस रोचक पोस्ट के लिए बधाई.

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    धन्यवाद ,,,,,,ऐसा पुरुष आपको कही अपने पड़ोस में देखने को मिल जायेगा ,,,खास कर नव विवाहित जोड़ा …..

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    सुक्रिया ……अभी आगे आगे आपको और भी बहुत कुछ मज़ेदार पढने को मिलेगा ……

satish3840 के द्वारा
January 21, 2012

सुमित नेथानी जी आप की रचना पढी व् पाठकों की प्रतिकिर्या पढी बहुत मन को छू गयी / पति पत्नी में कोई भी बेचारा नहीं दोनों एक साथ चलने वाले हें / जहां प्यार होगा तो लड़ाई तो होगी ही , प्यार के साथ साथ दोनों में त्याग भी होता हें / पड़ी क्यों की परिवार का मुखिया हे तो उसका त्याग ज्यादा दिखाई देता हें / पानी परिवार की बेल को आगे बढाती हे , पुरे परिवार का ध्यान रखती हे तो उसका गरजना शायद ही किसी को बुरा लगता हें / मेरी शादी को अगले साल पच्चीस साल हो जायेंगे / में और मेरी श्रीमती जी न जाने कब झगड़ पड़े पता ही नहीं / परन्तु जब वो मुझसे कुछ दिन के लिए दूर चली जाती हे तो भूख न जाने चली जाती हे / वास्तव में पति पत्नी के बीच लड़ाई एक संबध को प्रगाढ़ करती हे / मुझे याद हे मेरी बीमारी के समय जब उसने मेरी दिन रात सेवा की / दिल के दोरे के समय वास्तव में उसने दिन रात एक कर दिया / इस लिए न नारी बेचारी हे न नर दोनों का अपना अपना रोल हे / यूँ मजाक व्यंग्य में हम कुछ भी कह ले परन्तु दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे हें / यं मान लीजीये भारत में पति पत्नी का रिश्ता प्रधानमंत्री व् रास्ट्र पति सा हे / खैर जो भी हो आपकी रचना वाकई अच्छी हे / भगवान् करे आप आप न रहें व् हम हो जाएँ / खूब गुजरेगी जब मिल बैठेगें दीवाने दो /

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    मैं आपकी बात से पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ….मगर शायद आपने मेरी आनंद जी को करी कमेन्ट नहीं पड़ी …मैंने लिखा है कि ८५ % घरो में ऐसा होता है ….आपका परिवार बाकी बचे हुवे १५ % में आता है ….ये जानकर अच्छा लगा …..अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए सुक्रिया

anandpravin के द्वारा
January 21, 2012

सुमित भाई,
“गूढ़ रहस्य महिलाओं का, समझ सका ना कोई,
पति बन कर देख लो, कैसी हालत होई”
हालाकि मैं भी आप की तरह कुवारा ही हूँ, पर आपकी रचना पढ़ कर अपनी इस अवस्था पर “feelgood ” कर रहां हूँ
एक बात कहना चाहूंगा, मैं इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ, हमने पढ़ा था की “सिन्धु” सभ्यता में समाज मात्रिस्तात्मक था तो “वैदिक” में पुरुश्स्तात्मक
पर आज पता नहीं कौन किस पर हावी है, ज़रा इसपर मेरा संसय दूर करने की कृपा करिएगा

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    आज के वक़्त में मैं मानता हु की है तो समाज की नज़र में पिता ही परिवार का मुख्या है…मगर हर घर में झांक के देखो तो ८५% से ज्यादा घरो में नारी का ही हुकम चलता है…..बाकि आप समझदार तो है ही …….

sinsera के द्वारा
January 21, 2012

सुमित जी, आप की बातें ऐसी हैं जैसे “मन मन भावे गर्दन हिलावे” .ये खुद को बेचारा कहने वाले बेचारा बनने के लिए बेचैन भी रहते हैं. खाना खा कर कहते हैं कि मुझे तो भूख ही नहीं थी. अब बेचारी प्लेट तो खाली हो गयी ना………

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    समझ रहा हूँ आपकी बात को …..आपका इशारा जिस तरफ है ….

manoranjanthakur के द्वारा
January 21, 2012

सुंदर
सोचनिए
मंथन
विमर्श का विषय
बहुत बधाई

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    धन्यवाद

mparveen के द्वारा
January 21, 2012

सुमित भाई आपके दोस्त की अगर वास्तविकता ऐसी है तो वाकई सहानुभूति लायक है . …
रही बात बेचारे की तो कोई भी बेचारा नहीं न तो मर्द न ही औरत . ये सब तब होता है जब आपस में तालमेल की कमी हो .
आपके दोस्त को बहुत बहुत सहानुभूति !!!!!
आपको बधाई की आप अभी बेचारे नहीं बने हो ( हा हा हा हा हा )!!!!

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    मेरा ऐसा कोई दोस्त नहीं है ….ये काल्पनिक दोस्त है …..क्युकी ये उन लोगो के दिल की बात है जो इस परेशानी से रोज़ रूबरू होते है …………

January 21, 2012

सुमित जी नमस्कार….क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये और बिन भी रहा नहीं जाये… बड़ी द्वंद मे हूँ अगर आपका सपोर्ट करूँ तो महिला मित्रों के गुस्से का कोप भाजन बनने  का डर और अगर आप से असहमत हूँ तो न्याय भी नहीं होगा। फिर भी गांधी जी ने कहा है अगर आपको कोई गली दे तो उसे माफ कर दें….मैं आप के, अपने , मित्रों के कष्ट से अनभिज्ञ नहीं हूँ…..आपके इस व्यंग और यथार्थ पर आपको बहुत बहुत बधाई !!

    Sumit के द्वारा
    January 21, 2012

    आप कुछ मत कहिये…..आपने अपना कीमती वक़्त दिया ये ही मेरे लिए काफी है ………..

    jlsingh के द्वारा
    January 21, 2012

    डाक्टर साहब, नमस्कार!
    आपका महिला मित्रों? कहने से क्या अर्थ निकाला जाय! जिन्हें आप रात को जग कर चिट्ठी (ख़त) लिखा करते है???…
    चोरी पकड़ी गयी…… हा हा हा !!!

Rajkamal Sharma के द्वारा
January 20, 2012

अच्छी लगी आपके उन मित्र (दुखी आत्मा ) की यह मजेदार रचना
आपसे अनुरोध है की उस दुखी आत्मा के दूसरे दुखो को भी हम सभी से अगर सांझा कर सके तो हम आप दोनों (एक कुंवारा तो दूसरा शादीशुदा ) के बेहद आभारी होंगे
हा हा हा हा हा हा हा

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    राजकमल जी प्रोत्साहन देने के लिए धन्यवाद ….

D33P के द्वारा
January 20, 2012

निजी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है। इस रिश्ते की डोर में ही परिवार के सारे रिश्ते पिरोए होते हैं। अगर ये धागा टूट जाए तो समझिए परिवार बिखरने में देर नहीं लगेगी। अगर परिवार को सहेजकर रखना चाहते हैं तो अपने दाम्पत्य को दिव्य बनाइए।

आज के दौर में दो तरह के दाम्पत्य चल रहे हैं, एक असंतुष्ट और दूसरा अशांत। कहीं संसाधनों को जुटाने में दाम्पत्य दांव पर लगाया जा रहा है तो कहीं विश्वास के अभाव में गृहस्थी की बलि चढ़ाई जा रही है।

पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ प्रेम और विश्वास इन दो पहियों पर चलता है। एक भी पहिया डगमगाया तो रिश्ते का पतन तय है। आजकल युवा दम्पत्तियों में एक शिकायत आम है कि आपस में बात नहीं हो पाती। दोनों के बीच कोई अनदेखी सी दीवार खड़ी है। यहीं से प्रेम के कम होने और भरोसे के डिगने का क्रम शुरू होता है। अपने रिश्ते को प्रेम से सिंचिए।

कई रिश्ते केवल शब्दों पर टिके होते हैं, शब्दों का आधार हटते ही गिर जाते हैं। बातचीत कम हुई कि रिश्ते में दुराव शुरू हो जाता है। जबकि अगर रिश्ते में प्रेम हो तो शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। बिन कहे, बिन सुने बात हो जाती है।

रामचरितमानस में राम सीता का दाम्पत्य ऐसा ही था। ना शब्द थे, न कोई बात, बस भावों से ही एक-दूसरे को समझ जाते। वनवास में जब राम, सीता और लक्ष्मण को केवट ने गंगा के पार उतारा तो राम के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। वे इधर -उधर कुछ देख रहे थे। तभी तुलसीदास ने लिखा है

पिय हिय की सिय जान निहारी, मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

अर्थात सीता ने बिना राम के कहे, सिर्फ उनके हाव-भाव देखकर ही समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देने के लिए कोई वस्तु ढूंढ़ रहे हैं और उन्होंने अंगुली से अंगुठी उतार कर दे दी। निजी संबंधों में प्रेम ऐसा हो कि शब्दों के बगैर भी बात हो जाए। वो ही रिश्ता सफल भी है और सुखी भी।

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    समझाने के लिए धन्यवाद

alkargupta1 के द्वारा
January 20, 2012

सुमित जी , बेचारा तो दोनों में से कोई भी नहीं है जब जिसका पलड़ा भारी हो जाता है
जीत उसी की हो जाती है और कोई भी मौके पर वार करने से नहीं चूकता इसलिए तो जीवन
दोनों ही की अपनी अपनी जगह अहम भूमिका होती है दोनों ही एक दूसरे के पहलू हैं एक दूसरे
के बिना दोनों ही का जीवन अधूरा है इस जीवन रथ को चलने के लिए दोनों ही चक्रों का संतुलित
होना अति आवश्यक है…..आभार

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    अलका जी मेरी आँखे खोलने के लिए सुक्रिया ……….

Amita Srivastava के द्वारा
January 20, 2012

सुमित जी
न तो नर बेचारा
और न नारी बेचारी
आफत तब आती है भैया ,जब
किसी एक की अक्ल जाती है मारी |
वरना बिना एक -दुसरे के
नही चलती इस जीवन की गाड़ी |
बधाई

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    सुक्रिया अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए

minujha के द्वारा
January 20, 2012

अच्छा व्यंगात्मक आलेख लिखा है आपने,

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    बहुत सुक्रिया

nishamittal के द्वारा
January 20, 2012

यदि आपकी स्थिति यही है,तो मुझको आपसे सहानुभूति है.

    nishamittal के द्वारा
    January 20, 2012

    स्थिति पति-पत्नी के रूप में नहीं किसी भी रूप में हो सकती है.

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    मैंने आखिरी में लिखा है की मैं अभी इस सुख से वंचित हूँ ….मतलब मैं कुवारा हूँ ,,,,,,

dineshaastik के द्वारा
January 20, 2012

कृपया इसे भी पढ़े–
आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2
http://dineshaastik.jagranjunction.com/

dineshaastik के द्वारा
January 20, 2012

बहुत सुन्दर किन्तु एक पक्षीय, नारी में अवगुणों की अपेक्षा गुण अधिक होते हैं,
उस पर भी कुछ प्रकाश डालते तो शायद नारी के साथ न्याय होता।

    Sumit के द्वारा
    January 20, 2012

    ये काम तो लगभग सभी लेखिकाए कर रही है………




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