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एक अनोखा पत्र

पोस्टेड ओन: 24 Jan, 2012 जनरल डब्बा में

रविवार को मेरे एक मित्र ने मुझे सुबह सुबह फ़ोन कर के अपने घर बुलाया, फ़ोन पर उसकी बातो से उत्सुकता झलक रही थी ,,,,,,, मेरे ये मित्र एक डाक खाने में काम करते है ,,इसलिए मुझे उनकी उत्सुकता का कारण समझ नहीं आ रहा था ,, वैसे मैं रविवार को अपने परिवार के साथ रहना पसंद करता हूँ….खैर जब उन्होंने बुलाया है तो जाना ही पड़ेगा ,,

मेरे मित्र ने चाय मंगाई और मेरे हाथ में एक पत्र दिया ,,,,और उसे अपनी उत्सकता का कारण बताया … एक मामूली पत्र देख कर कर मैं बहुत निराश हुआ …परन्तु जब उन्होंने पत्र पर लिखा पता पढने को कहा ………………

पत्र पे लिखा पता कुछ इस प्रकार था..

सेवा में,

श्री गणेश भगवान्

पुत्र श्री शिव भगवान्

पता – मेरे अनाथ आश्रम से चौथा चोराहा,

रायपुर,  देहरादून

पहले तो मुझे लगा,  किसी बेवकूफ ने लिखा है ये पत्र ,,,मगर बार बार इस पत्र पे लिखे पते को पढ़ पढ़ कर मेरी उत्सुकता बढती गयी ……..

अब हमे उस पत्र को खोलने की जल्दी थी ,, क्युकी ऐसे पत्र कही पोस्ट नही किये जाते ,,,और मेरे मित्र ने इस पत्र में उत्सुकता दिखाई थी ,,,इसलिए वो इसे अपने साथ ले आया …… अब हमने देर न करते हुवे पत्र खोला और पढना शुरु किया ———-

“ये मेरी पहली चिट्टी है, मुझे नहीं पता कि चिट्टी कैसे लिखी जाती है ,,,मगर भगवन जी पहले मैं आपको अपने बारे में बताना चाहता हूँ ,.,,मेरा नाम राजू है, मैं आपके मंदिर से थोड़ी दुरी पे, एक अनाथ आश्रम में रहता हूँ ,,मेरी उम्र 10 साल है, मेरी एक टांग में कुछ तकलीफ है, जिसकी वजह से मैं ढंग से नहीं चल पाता…….

वैसे यहाँ मेरे बहुत से दोस्त है, बहुत अच्छे अध्यापक है (अनाथ आश्रम में शिक्षा भी दी जाती है),,,,मुझे मेरी एक अध्यापिका ने बताया कि आप सबकी इच्छा पूरी करते हो..इसलिए ही मैं आपको पत्र लिख रहा हु ……

मेरी कुछ इच्छाए है, आप तो सब कर सकते हो, इन्हें भी पूरा कर दो…

हमारे अनाथ आश्रम में कोई न कोई आता है और हम में से किसी को अपने साथ ले जाते है ,,,मेरी अध्यापिका कहती है ये उनके मम्मी पापा होते है, जो उन्हें ढूदते रहते है,,और जब उन्हें उनका बच्चा यहाँ मिल जाता है तो वो उसे अपने साथ अपने घर ले जाते है…..   मैं अक्सर बच्चो को अपने मम्मी पापा के साथ देखता तो मेरा भी मन करता की मेरे भी मम्मी पापा हो, जो मुझसे ऐसे ही प्यार करे, मेरे लिए टॉफी लाये, मुझे घुमाने ले जाये……….

हे भगवान् ,,मेरे जैसे यहाँ और भी बच्चे है,,,अपने लिए मम्मी पापा चाहते है, मगर जितने भी मम्मी पापा आते है ,,,वो हम सब को पसंद नही करते …क्युकी हम में कुछ न कुछ कमी है ….आपने हमे ऐसा क्यों बनाया, जो कोई भी हमे अपने साथ नहीं ले जाना चाहता …..

मुझे भी मम्मी का प्यार चहिये,,पापा का हाथ पकड़ के मैं भी चलना चाहता हूँ…….आप कब मेरे मम्मी पापा को भेजोगे …….. और अगली बार मुझे ऐसा जीवन मत देना ,,,,,,,,जिसमे मम्मी पापा का प्यार न हो …..”

पत्र समाप्त हुआ …..अब मेरे और मेरे मित्र के दिमाग में कई सवाल चल रहे थे ……

जहा मेरे मित्र ये कह रहा था की ” कैसे लोग है, जो किसी शारीरिक  कमी के कारण किसी को अपनाने से मना कर देते है, कैसे है ये लोग ?????”

वही मेरे मन में ये बात आ रही थी की ” कैसी है वो माँ जो अपने बच्चे को जनम देके, किसी शारीरिक कमी के कारण छोड़ देती है, जब उसकी माँ ने ही उसे नहीं अपनाया, तो और कोई, क्यों अपनाये ?”

एक बात और जो मेरे मन में आ रही थी,,,” अक्सर हम नेता – अभिनेता के पीछे दीवाने रहते है और उनके लिए कुछ भी करने को ( फर्स्ट डे फर्स्ट शो फिल्मे देखना या किसी नेता की  रैली में शामिल होना/ प्रचार करना) तैयार होते है ,,,मगर ऐसे बच्चो के विकास के लिए कुछ ही लोग आगे आते है, आखिर क्यों ?????

सच में ये एक अनोखा पत्र था, और इसने बहुत सी बातें सोचने और कुछ करने को उत्साहित किया …………

आपका क्या ख्याल है, इस पत्र के बारे में मुझे जरुर बताना ,,,,,,,,,,,,,,,

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
February 1, 2012

सुमित जी आखिर पकड़ मैं आ ही गया आपका ये वाला लेख , बहुत सुन्दर ! सुमित जी
हमारी अंतर्चेतना को जगाता ये पत्र वाकई बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है |
धन्यवाद

http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/30

    Sumit के द्वारा
    February 2, 2012

    आपने मेरे लेख के प्रति इंतनी उत्सुकता दिखाई ……मैं आपका बहुत आभारी हूँ …..

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 28, 2012

अत्यंत ही मर्मस्पर्शी ब्लॉग। बहुत बढ़िया।

    Sumit के द्वारा
    January 31, 2012

    बहुत बहुत सुक्रिया वाहिद जी

January 28, 2012

सुमित जी नमस्कार ! आपको बसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनायें !एक संवेदनशील, अन्तर्मन को झकझोर देने वाली सुंदर प्रस्तुति । आपने इस संवेदनशील विषय को मंच पर प्रस्तुत किया बहुत बहुत बधाई।

    Sumit के द्वारा
    January 28, 2012

    आपको भी बधाई …….

Amita Srivastava के द्वारा
January 27, 2012

सुमित जी
हमारी अंतर्चेतना को जगाता ये पत्र वाकई बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है |
धन्यवाद

    Sumit के द्वारा
    January 27, 2012

    अमिता जी धन्यवाद

akraktale के द्वारा
January 27, 2012

सुमित जी नमस्कार,
इतने सुन्दर तरीके से लिखने से आपके लेखन की प्रतिभा और संवेदनशीलता दोनों का साफ़ अंदाजा होता है. सभी को इन लोगों के लिए भी कुछ समय अवश्य ही निकालना चाहिए सिर्फ कुछ रुपये दे देना ही काफी नहीं है. आभार आपका जो आपने इस ओर सोचने को मजबूर किया.

    Sumit के द्वारा
    January 27, 2012

    आखिर कब तक हम देश को लुटने वालो के पीछे लाध्ते रहेंगे ,,,,,लड़ना ही है तो ऐसे अनेक बच्चो के भविष्य के लिए लड़े……

dineshaastik के द्वारा
January 27, 2012

पत्र आपका बहुत मार्मिक,
पढ़कर हुआ हूँ भावुक।
बच्चे ने इक प्रश्न किया था,
उसे जानने का इच्छुक।
ऐसा क्यों है मुझे बनाया,
इसका उत्तर नहीं मिला।
शायद उत्तर नहीं मिलेगा,
ईश्वर से है यही गिला।।
कृपया इसे भी पढ़े-
क्या यही गणतंत्र है
http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    Sumit के द्वारा
    January 27, 2012

    सुंदर पंक्तिया लिखने के लिए धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
January 27, 2012

बस यही कहूँगा कि आपकी सम्वेदना अद्भुत है जों कि एक पत्र के माध्यम से साझा किया!…

    Sumit के द्वारा
    January 27, 2012

    शुक्रिया शुक्रिया ………………….

viplavimayank के द्वारा
January 26, 2012

सचमुच आपने एक अनोखे विषय का चयन किया है..और अपनी बात को बहुत ही उम्दा ढंग से व्यक्त किया है|इस हृदयस्पर्शी पत्र को पढ़ कर मुंह से बस यही निकलता है…भगवान कभी किसी को बेबस न बनायें

    Sumit के द्वारा
    January 27, 2012

    सच में , भगवन किसी को ऐसा न बनाये…….

Lahar के द्वारा
January 26, 2012

बात मन को छू गई |

    Sumit के द्वारा
    January 26, 2012

    सुक्रिया…..

abodhbaalak के द्वारा
January 25, 2012

सुमित जी
दिल को छु लेने वाली रचना,
क्या कहें, कहने को तो बहुत कुछ है पर हमारी मानसिकता ………..
ऐसे ही लिखते रहें
http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Sumit के द्वारा
    January 26, 2012

    कमेन्ट के लिए धन्यवाद

roshni के द्वारा
January 25, 2012

सुमित जी
ये पत्र बहुत कुछ सोचने को मजबूर कता है मगर ये दुनिया है यहाँ लोग सिर्फ अच्छा चाहते है कमियों को कोई भी सवीकार नहीं करना चाहता जब किसी के अपने माँ बाप ही उसे त्यांग दे तो फिर बाकि दुनिया तो यु भी पत्थर की होती है
मार्मिक पत्र
आभार

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    धन्यवाद ,,,और बिलकुल सही कहा आपने ….मगर इस बारे में कुछ तो करना होगा ….

anandpravin के द्वारा
January 25, 2012

सुलेखन के लिए बधाई

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    सुक्रिया

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
January 25, 2012

बहुत सुन्दर आलेख.बधाई! सुमित जी.

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    बहुत बहुत सुक्रिया

mparveen के द्वारा
January 25, 2012

सुमित जी नमस्कार,
आपका अनोखा पत्र तो वाकई में अनोखा है . और माँ बाप का प्यार तो उसको भी चाहिए न क्या हुआ अगर वह विकलांग है तो . अपने कलेजे के टुकड़े को कोई कैसे छोड़ सकता है जबकि उसके साथ तो पहले ही नाइंसाफी हो चुकी हो शारीर में किसी अंग की कमी के कारन ऊपर से माँ बाप द्वारा परित्यक्त …………
बहुत सुंदर !!!

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    वैसे कई माँ बाप है जो अपने बच्चो को त्यागने की जगह आपनते है,,,,,मगर

sinsera के द्वारा
January 24, 2012

सुमित जी नमस्कार,
आप ही की तरह एक छोटा सा दरियादिल लड़का मेरा काफी अच्छा दोस्त है,इलेक्ट्रोनिक मीडिया में जॉब करता है और चुप चाप बिना किसी को बताये अपनी आधी सेलरी एक अनाथालय में दे देता है.मुझे जब यह बात पता चली तो अपने ऊपर शर्म महसूस हुई क्यूँ कि मैं हर दरवाज़े पर जा कर अनाथालय के लिए चंदा मांगने वालो को छोटी मोटी राशि दे कर अपने को महान समझती थी.आप ने एक नेक आवाज़ उठाई है, इस के लिए आप को बधाई…

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    जान के अच्छा लगा की आज भी इस दुनिया में नेकी करने वाले इंसान जिंदा है …….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 24, 2012

सुमित जी,
यह सच्चाई है. हर आदमी पूरे को देखता है. इनकी पीड़ा वास्तव में कोई नहीं समझता . लेख आँखें खोलने के लिए है. आप अपनी बात कहने में सफल रहे. बधाई. आप ब्लॉग में असली चेहरे के साथ आयें.

    Sumit के द्वारा
    January 25, 2012

    धन्यवाद




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