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न आये लौट के

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रूठकर गयी थी सुबह मुझसे
रात का दर्पण दिखा कर
फिर लौट आयी है सुबह !!.
.
रूठकर गयी थी बहार मुझसे
पतझड के पत्ते उड़ा कर
फिर लौट आयी है फिजा !!
.
रूठकर जो गये तुम मुझसे
न आये लौट के…..लौट के आयी
मन का अज़ाब और यादें नाचार !!
.
.
अज़ाब =पीड़ा, नाचार =असहाय
सुमित नैथानी

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
July 5, 2013

वाह सुन्दर हाँ हिंदी अर्थ देने से सुविधा रहती है

manoranjanthakur के द्वारा
July 2, 2013

बेहतरीन ….बहुत बधाई

ashishgonda के द्वारा
July 1, 2013

मित्र सुमित जी! बहुत ही भावपूर्ण कविता पर हार्दिक बधाई… कभी लिखी गई ये चार पंक्तियाँ आज यूँ ही याद गईं- “कोई लिखता हूँ कविता तो नया अंदाज़ देती है, कोई पढता हूँ कविता तो ये सुर में साज देती है, लौट आने का वादा कर गए तुम कभी हमसे, चले आओ तुम्हें मेरी कलम आवाज़ देती है…” जब भी आपको मिले तो मेरी भी एक ताज़ी कविता पढ़िएगा- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2013/07/01/%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87/

    Sumit के द्वारा
    July 2, 2013

    शुक्रिया

sinsera के द्वारा
June 29, 2013

प्रकृति के नियम अपनी जगह और मनुष्य की प्रकृति अपनी जगह…..

    Sumit के द्वारा
    July 2, 2013

    ये भी खूब कही


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