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कागज़ी आज़ादी

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एक बार फिर दिल से, गुस्ताखी माफ़ अगर लगे दिल पे
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आज कल हर कोई  स्वतंत्रता दिवस के रंग में रंगा है, ऐसे में मेरे मन में कुछ विचार आये है … जो शायद  क्रांति नहीं ला सकते और न ही उनमे कोई बोद्धिकता है | फिर भी लिख रहा हूँ और आप सबके साथ साँझा कर रहा हूँ ….
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बात तब की है, जब मैं बचपने की गोद में खेला करता था, दूरदर्शन पर स्वतंत्रता दिवस के दिन मनोज कुमार की शहीद दिखाई गयी, फिल्म इतनी अच्छी लगी कि मुझे भारत माँ के  सबसे महान और वीर बेटे  भगत सिंह ही नज़र आने लगे | अब कोई मुझसे पूछता, “तुम्हे कौन अच्छा लगता है या तुम किस की तरह बनना चाहते हो”, तो मैं तपाक से जवाब देता, “भगत सिंह जैसा” धीरे धीरे मैं बड़ा हुआ और मेरा बोद्धिक विकास निम्न स्तर का होता चला गया ….
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अब मैं सोचता हूँ, क्या इतना कह देने से कि मैं भगत सिंह या राजगुरु को मानता हूँ, पूजता हूँ, सिर्फ कह देना ही काफी है, यदि हां तो मैं अभी भी बचपने की देहलीज़ पर हूँ और यदि न तो आखिर हमने ऐसा क्या कार्य किया है, जो हम इन्हें अपना आदर्श व्यक्तित्व मानते है ….
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लेखको में खासकर एक बात आम है या नज़र आती है , इनसे सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें कागजों पर लिखवा लो, किसी महान व्यक्ति का चरित्र चित्रण करवा लो .. या किसी विधा पर लिखवा लो, मगर एक बार उन्हें ये कहकर देखो कि देश के लिए कुछ करोगे , तो लेखक महाशय कहेंगे, “देखते नहीं हो मैं काम कर रहा हूँ, विचारो को कागजों पर उड़ेल रहा हूँ ….”
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हमारे देश भारत ओह माफ़ कीजिये इंडिया में, एक रिवाज़ और जोरो पर है, पहले भी था, मगर आज कल कुछ ज्यादा ही प्रभावी है , वो रिवाज़ है अपने नाम के साथ किसी महान हस्ती , फिल्म कलाकार या किसी नेता का नाम जोड़ लेना… क्या सिर्फ अपने नाम के साथ किसी का नाम जोड़ लेने से, किसी अन्य  व्यक्ति के गुण आपकी आत्मा, बुद्धि और स्वभाव को प्रभावित कर सकते है, अगर नहीं तो फिर किसी का नाम या उपनाम , अपने साथ के साथ क्यों  जोड़ा जाये और अगर हां, तो फिर सिर्फ फिल्म कलाकारों या किसी अन्य का नाम जोड़ लेने के बजाए विवेकानंद जी या दयानन्द  जी जैसे ज्ञानियों के नाम क्यों नहीं जोड़े  जाते….
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कागज़ी आज़ादी तो हमे 1947 में ही मिल गयी थी, मगर  अफ़सोस की बात है कि आज भी हम कागज़ी जंग ही लड़ रहे है और आगे भी जाने कितने सालो तक ये जंग बरक़रार रहेगी ….
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पता नहीं कभी-कभी मुझे क्या हो जाता है, शायद पागलपन के दौरे पड़ते है, खुमारी में जाने क्या-क्या लिख जाता हूँ… आज स्वतंत्रता दिवस है, तो अब मैं भी चलता हूँ, छत पर पतंग उड़ा कर, मार्किट या किसी मोल में जा कर कुछ कपडे खरीद लूँगा , शाम को एक नयी फिल्म देखूंगा और रात का डिनर किसी होटल में करने के पश्चात घर आकर  सो जाऊंगा …. बाकि दिन ऑफिस, टाइम ही कहाँ है मेरे पास………और जो खाली वक़्त, है भी मेरे पास, उसे मैं अपने देश के नाम नयोछावर करता हूँ, कागज़ पर लिख लिख कर …………

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nikhil के द्वारा
August 17, 2013

सटीक लेख सुमित जी. बधाई

    Sumit के द्वारा
    August 18, 2013

    भाई शुक्रिया प्रतिक्रिया के लिए

harirawat के द्वारा
August 17, 2013

सुमित बहुत सुन्दर, सटीक, सार्थक, एक जलता बलता सन्देश, बधाई और बड़ा होने के नाते आशीर्वाद ! तुमने बिलकुल कांटे की बात कही है की हमें असली आजादी तो अभी मिली ही नहीं, केवल कागजी आजादी मिली है ! आजादी मिली है, उन लोगों को जो सता पर काविज हैं और आम आदमी का और गरीब का रक्त चूस रहे हैं ! चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, ये बरसाती मेढक की तरह टर टराते हैं, गरीबों के घरों में जाकर उनका नमक खा आते हैं अगर जीत गए तो मंत्री नहीं तो अन्तरिक्ष में समा जाते हैं, क्यों की इनके कुकर्म अगली सरकार द्वारा बाहर आते हैं ! तुम मेरे ब्लॉग पर आये अच्छा लगा ! कविता में जो बदलाव बतलाया मैंने कर दिया, धन्यवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

    Sumit के द्वारा
    August 18, 2013

    शुक्रिया सर जी

nishamittal के द्वारा
August 17, 2013

सही लिखा सुमित

    Sumit के द्वारा
    August 18, 2013

    शुक्रिया निशा जी

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 16, 2013

जी सुमित जी सुनने में कडवा तो जरुर लगता है ये सब लेकिन अधिकतर सच तो है ही कुछ अपवाद तो रहते ही हैं …वैसे हर आदमी हर काम कर भी नहीं सकता ..लेखक न लिखे मीडिया वाले न दिखाएँ अखबार वाले छापना बंद करें तो करे कौन ? हाँ सब में देश की भावना जुडी हो तो आनंद और आये विचारणीय पोस्ट भ्रमर ५

    jlsingh के द्वारा
    August 16, 2013

    भ्रमर जी से सहमत! सुमित जी!

    Sumit के द्वारा
    August 17, 2013

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया … मगर आज ये देश – भावना से नहीं मात्र पैसा कमाने हेतु किये गए कार्यो की गिनती में आता है

    Sumit के द्वारा
    August 17, 2013

    जवाहर जी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

deepakbijnory के द्वारा
August 15, 2013

सच को शब्दों में पिरो दिया आपने सुमित जी एक करवा सच

    Sumit के द्वारा
    August 15, 2013

    दीपक जी @ शुक्रिया


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