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गुलाबी चूड़ियाँ ( नागार्जुन जी की याद में )

Posted On: 30 Aug, 2013 Others में

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नागार्जुन प्रगतिवादी विचारधारा के लेखक और कवि हैं। नागार्जुन ने 1945 ई. के आसपास साहित्य सेवा के क्षेत्र में क़दम रखा। शून्यवाद के रूप में नागार्जुन का नाम विशेष उल्लेखनीय है। नागार्जुन का असली नाम ‘वैद्यनाथ मिश्र’ था। हिन्दी साहित्य में उन्होंने ‘नागार्जुन’ तथा मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से रचनाओं का सृजन किया।

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उनके स्वयं कहे अनुसार उनकी 40 राजनीतिक कविताओं का चिरप्रतीक्षित संग्रह ‘विशाखा’ आज भी उपलब्ध नहीं है। संभावना भर की जा सकती है कि कभी छुटफुट रूप में प्रकाशित हो गयी हो, किंतु वह इस रूप में चिह्नित नहीं है। सो कुल मिलाकर तीसरा संग्रह अब भी प्रतीक्षित ही मानना चाहिए। हिंदी में उनकी बहुत-सी काव्य पुस्तकें हैं। यह सर्वविदित है। उनकी प्रमुख रचना-भाषाएं मैथिली और हिंदी ही रही हैं। मैथिली उनकी मातृभाषा है और हिंदी राष्ट्रभाषा के महत्व से उतनी नही जितनी उनके सहज स्वाभाविक और कहें तो प्रकृत रचना-भाषा के तौर पर उनके बड़े काव्यकर्म का माध्यम बनी। अबतक प्रकाश में आ सके उनके समस्त लेखन का अनुपात विस्मयकारी रूप से मैथिली में बहुत कम और हिंदी में बहुत अधिक है। अपनी प्रभावान्विति में ‘अकाल और उसके बाद’ कविता में अभिव्यक्त नागार्जुन की करुणा साधारण दुर्भिक्ष के दर्द से बहुत आगे तक की लगती है। ‘फटेहाली’ महज कोई बौद्धिक प्रदर्शन है। इस पथ को प्रशस्त करने का भी मैथिली-श्रेय यात्री जी को ही है।

नागार्जुन की प्रकाशित रचनाओं का दूसरा वर्ग कविताओं का है। उनकी अनेक कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। ‘युगधारा’ (1952) उनका प्रारम्भिक काव्य संकलन है। इधर की कविताओं का एक संग्रह ‘सतरंगे पंखोंवाली’ प्रकाशित हुआ है। कवि की हैसियत से नागार्जुन प्रगतिशील और एक हद तक प्रयोगशील भी हैं। उनकी अनेक कविताएँ प्रगति और प्रयोग के मणिकांचन संयोग के कारण इस प्रकार के सहज भाव सौंदर्य से दीप्त हो उठी हैं। आधुनिक हिन्दी कविता में शिष्ट गम्भीर तथा सूक्ष्म चुटीले व्यंग्य की दृष्टि से भी नागार्जुन की कुछ रचनाएँ अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। इन्होंने कहीं-कहीं सरस मार्मिक प्रकृति चित्रण भी किया है।

आप सब के साथ नागार्जुन जी की एक सुंदर कविता साँझा कर रहा हूँ, जिसका नाम है – गुलाबी चूड़ियाँ

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
September 6, 2013

सुमित सच्चा सिपाही है ……………हिंदी का . मुझे गर्व है तुम पर

jlsingh के द्वारा
August 31, 2013

वाह सुमित जी! आपने मर है नहले पे दहला क्या अभी तक जागरण जंक्सन को पता नहीं चला वो जो है ‘कांच की चूड़िया’ जागरण जंक्सन के मुख्य पृष्ठ यानी होम पेज पर सुशोभित अमरसिं के नाम से अंकित जागरण जंक्सन टीम कृपया ध्यान दीजिये वरना कल होकर रामायण महाभारत को भी अपने नाम से छाप लेंगे गोस्वामी जी और वेदव्यास को भी जलाकर ताप लेंगे

    Sumit के द्वारा
    August 31, 2013

    जागरूकता सब जगह चाहिए….वो तो अमर जी ने अपने कमेंट बॉक्स को बंद कर रखा है…. वरना मेरे प्रेम सन्देश सीधा उनके पास ही जाते, मुझे अलग से पोस्ट नहीं करना पड़ता

    alkargupta1 के द्वारा
    August 31, 2013

    आदरणीय सिंह साहब , मैंने जिस दिन यह कविता पढ़ी थी उसी दिन जागरण वालों को सूचित कर दिया था क्योंकि यह टॉप ब्लॉग में भी थी दूसरे दिन भी टॉप ब्लॉग में दर्शायी जा रही थी जो उचित नहीं था और नहीं उनके कान में कोई जून रेंगी इन महाशय ने इतने बड़े कवि की रचना चोरी करके और नाम बदलकर अपने नाम से पोस्ट कर दी थी और इनकी पोस्ट पर कमेंट भी स्पैम में जा रहे थे सुमित ने बहुत ही अच्छा काम किया जो कवि पर लिख कर उनकी यही कविता भी पोस्ट कर दी तांकि इन बलॉगर महाशय और इनके जैसे ही अन्यों की भी आखें खुल जाएँ यह काम बहुत गलत है जो इन्होने किया |

    alkargupta1 के द्वारा
    August 31, 2013

    सिंह साहब से पूर्णतः सहमत हूँ बहुत अच्छी पोस्ट डाली है सुमित तुमने जिसे आगे भी लोगों को यह सबक मिलेगा कि जो काम अमर ने किया है वह न किया जाये आभार

Madan Mohan saxena के द्वारा
August 30, 2013

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति कभी यहाँ भी पधारें

    Sumit के द्वारा
    August 31, 2013

    मदन जी…ये पोस्ट जागरूकता के लिए की गयी है …आपके यहाँ भी आयेंगे जरुर

sinsera के द्वारा
August 30, 2013

बहुत सुन्दर पहल सुमित , जो इस तरह की भूली बिसरी साहित्यिक अमानातें लोगो तक पहुंचाते हैं …वर्ना यहाँ तो लोगो को अपनी ही कहा-सुनी से फुर्सत कहाँ ….. इतनी सुन्दर कविता पढ़ाने के लिए धन्यवाद…..

    Sumit के द्वारा
    August 31, 2013

    इसका भी कारण है ….. जो जवाहर जी ने बता दिया है


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