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एक खबर यह भी (लघु कथा )

Posted On: 4 Sep, 2013 Others में

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सुबह सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ रहा था , कही पर चोरी की वारदात, कही रेप केस , तो कही हत्या। । आखिरी के पन्नो पर खेल समाचार …और  होता ही क्या है एक न्यूज़ पेपर के अंदर …और जाने कितनी  समाज सुधारक बातें मन में विचरण करने लगी। । कल्पनाओं   के समुंदर में गोते लगाने के बजाए मैं ऑफिस के लिए तैयार होने लगा। ….
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घर से बाहर निकला ही था, कि मेरी नज़र एक कबाड़ बीनने वाले बच्चे पर गयी, जो सामने लगे विज्ञापन बोर्ड को बड़े ध्यान से देख रहा था…. आखिर वो क्या देख रहा था ? क्या पढ़ रहा  था ?  मेरे मन में उत्सुकता हुयी। …. मैं बच्चे के पास गया और पूछा “क्या कर रहा है यहाँ पर  ?” अचानक हुए इस वार से बच्चा पहले तो घबरा गया , और हडबडा कर बोल ” नहीं, कुछ भी तो नहीं ” …. मैं जानना चाहता था कि वो विज्ञापन बोर्ड पर क्या पढ़ रहा था, इसलिए मैंने प्यार से पूछा  ” बता न यार , क्या देख रहा था, उस बोर्ड पर, वहां तो कोई तस्वीर भी नहीं है ” बच्चे ने मेरे इस बर्ताव को देखकर, चेन की सांस ली और बोला “ कुछ नहीं अंकल, ” मैंने कहा ” कुछ नहीं तो, इतनी देर से क्या देख रहा था इस बोर्ड पर” …..
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बच्चे ने कहा ” कुछ नहीं, ये जो अजीब सा बना होता है, वो मुझे बड़ा अच्छा लगता है,” मैंने कहा ” अरे इस पर तो कुछ नहीं बना हुआ है, तू किस की बात कर रहा है ” तब बच्चा बोला ” ये जो टेढ़ी मेडी डंडिया खिची हुयी है , मुझे बहुत अच्छी लगती है, आपको पता है अंकल, मैं रोज़ खाली  वक़्त में इन्हें बनाने की कोशिश करता हूँ “… बीच में टोकते हुए मैंने अपनी बात कही “जब ये इतना ही पसंद है तो स्कूल क्यों नहीं जाते !” उत्तर मिला ” पूरे दिन कबाड़ में रहने के बाद अंकल, शाम की रोटी हो पाती है , माँ हमेशा बीमार रहती है और बापू नशे में,” एक बार फिर उसकी बात काटी मैंने “पढना पसंद है तो , मैं तुम्हारी मदद करूँगा , रोज़ एक घंटे मेरे पास आना ” मेरी बात पूरी नहीं होने दी नादान ने ” हमारे यहाँ बच्चे स्कूल नहीं जाते, वो तो पैदा होते ही , पैसा कमाने लगते है, मोहल्ले में मेरा एक दोस्त है कल्लू , उसके घर पर सब बढ़िया है , फ्रिज , टेलीविज़न सब है, कोई दिक्कत नहीं , फिर भी स्कूल नहीं जाता , कबाड़ बीनता है क्योंकि  हमारे यहाँ सब यही काम करते है। । मैंने कई बार कहा कि मैं भी स्कूल जाना चाहता हूँ, तो सबने मेरा मजाक उड़ाया ” और बोलते बोलते कब उसकी आँखों से आसू छलक आये , मैं कुछ कह पाता उससे पहले वो वहां से जा चूका था। ….
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हमारे समाज का सबसे दुश्मन शायद यही है , जिस दिन न्यूज़ पेपर में इसके बारे में छपने लगेगा, तब और खबरे छपनी  बंद हो जाएँगी…. …

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 6, 2013

हमारे समाज का सबसे दुश्मन शायद यही है , जिस दिन न्यूज़ पेपर में इसके बारे में छपने लगेगा, तब और खबरे छपनी बंद हो जाएँगी…. दिल जीत लिया इस एक पंक्ति ने सुमित जी ! ऊपर की कहानी हमें और भी कहीं पढने को मिल सकती है लेकिन ये शब्द ….बहुत सुन्दर और प्रभावी !


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