Main Aur Meri Tanhai

Just another weblog

59 Posts

806 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8097 postid : 665121

आप तो ऐसे न थे

  • SocialTwist Tell-a-Friend

राजनीति का सबसे बड़ा पलटफेर होने के बाद, सभी राजीनीतिक दलों के मुह से निकल गया “आप तो ऐसे न थे” आप तो छा गए आसमान पर (हमे उम्मीद नहीं थी ऐसा होगा )| मगर इसके साथ ही  आप घिर गयी  काले बादलो से| आप ने दोनों बड़े राजनितिक दलों पर बार बार ऊँगली उठाई है, और आज आप को दिल्ली में अपनी सरकार बनाने के लिए इन्ही दलों का दामन थामना होगा | जहाँ आप प्रमुख अरविन्द जी ने किसी भी दल का दामन थामने की बजाय दुबारा  चुनाव को प्राथमिकता दी है, तो दूसरी तरफ दे दी है चटपटी चाट न्यूज़ चैनलों को चटकारे लेने के लिए |

.

हर किसी की अपनी राय और अपना फैसला, जहाँ किरण बेदी जी का मानना है कि बीजेपी और आप को मिलकर सरकार बनानी चाहिए, तो दूसरी तरफ न्यूज़ चैनलों पर आप के नेता बीजेपी को सिर्फ बातों के शेर और सपना दिखाने वाली पार्टी बता रही है | आप के कार्यकर्त्ता जिस तरह से बीजेपी की तरफ उंगलियाँ (कांग्रेस का अब आप नाम लेना भी नहीं चाहती ) उठाकर बीजेपी को कांग्रेस जैसा ही बताने पर तुली है, उससे तो यही ज़ाहिर होता है कि आप जनता के कन्धे पर बन्दूक रख शिकारी बनने की ख्वाहिश रखती  है, मगर सवाल है आप का शिकार कौन  ?

.

दूसरी तरफ बीजेपी भी चुप नहीं है और आप पर कीचड़ उछालने से पीछे नहीं हट रही है | आप लगातार जनता का शुक्रिया अदा कर रही है, मगर जनता की मदद से पीछे भी हट रही है, आखिर किसका साथ चाहती है आप ? जहाँ बीजेपी हमेशा कांग्रेस को निशाना बनाती आयी है तो अब आप बीजेपी को निशाने पर लिए बैठी है |

.

बाढ़ लगी है ट्विटर और फेसबुक स्टेटस की | सब लगे है एक दुसरे पर इल्जाम लगाने में | आप न जनता के लिए सत्ता में आ रही है और न ही किसी और को समर्थन दे, सत्ता का दावेदार बना रही है | कही न कही दाल में कुछ तो काला है |

.

ऐसे में आप के प्रमुख और आप समर्थको से कुछ सवालो के जवाब चाहूँगा :-

1.  यदि बीजेपी भी अन्य दलों के जैसी है, तो फिर मोदी जी बीजेपी के साथ क्यों ? क्या मोदी जी भी और नेताओ की तरह है ?

.

2. आप बीजेपी/कांग्रेस को समर्थन देने को तैयार नहीं है, अगर ६ महीने बाद भी  परिणाम  यही रहा तो आप क्या करेगी ? तब  आप बीजेपी/कांग्रेस को  समर्थन देगी या तब भी यही ड्रामेबाजी चालू रखेगी ?

.

3. क्या आप सच में आम जनता के लिए सोचती है, या ये वोट बनाने का मात्र एक जरिया था, जिसमे आप कामयाब भी रही ?

.

4. अगर आप आम जनता के लिए सोचती है तो क्यों नहीं बना रही है सरकार ? क्यों ६ महीने और चाहिए आप को ? आखिर क्या चल रहा है आप प्रमुख के माइंड में ?

.

5.  “आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे” मुहावरा आप ने पहले कभी सुना है ? कही आप का हाल भी इस मुहावरे की तरह  न हो जाये |

.

अभी भी वक़्त है आप के पास, संभल जाइये | वरना कुछ दिनों बाद आप समर्थक ही आप के लिए कहेंगे “आप तो ऐसे न थे “

*आप = आम आदमी पार्टी

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

37 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
December 18, 2013

सुन्दर चिंतनीय आलेख ,कभी इधर भी पधारें सादर मदन

    के द्वारा
    December 19, 2013

    शुक्रिया मदन जी

Chaatak के द्वारा
December 17, 2013

सुमित जी, आपके लेख को पढ़कर अच्छा लगा सही आंकलन किया है आपने और मेरा मानना है कि केजरीवाल को राजनीतिक शुचिता के अपने एजेंडे पर कायम रहते हुए राजनीती करनी चाहिए और सिर्फ मीडिया में सनसनी फ़ैलाने से परहेज़ करना चाहिए आज दिल्ली का आक्रोश उनके काम आया है लेकिन कल दिल्ली उनके विरुद्ध भी आक्रोशित हो सकती है|

    Sumit के द्वारा
    December 17, 2013

    चातक जी@ आप की गतिविधयो से तो ऐसा ही लग रहा है, जैसे ये पल करीब है आने को

yamunapathak के द्वारा
December 17, 2013

विचारणीय लेख

    Sumit के द्वारा
    December 17, 2013

    यमुना जी @ प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

आर एन शाही के द्वारा
December 16, 2013

सुमित भाई चिन्ता न करो, जल्दी ही पिक्चर रिलीज़ होगी और ट्रेलर्स का क्लाईमेक्स भी लोग जल्दी ही भूल जाएंगे । ‘आप’ ने एक नेक काम अवश्य किया है, वह यह कि मित्रवर श्रीमान प्रदीप जी कुशवाहा, आप, और हमारे जैसों को रोज़गार का एक बेहतरीन नुस्खा उपहार स्वरूप प्रदान किया है । मित्रवर की जल्दी ही घोषित होने वाली ‘बाप’ पार्टी के हम दोनों एवं श्रीमान जवाहरलाल जी भी, राष्ट्रीय महासचिव होंगे । शेष काबिल लोग तब तक क्यू की शोभा बढ़ाएंगे, बाद में योग्यतानुसार सभी को अवसर अवश्य मिलेगा । मित्रवर सीएम की बजाय सीधे पीएम के उम्मीदवार होंगे, और जाहिर है कि नमो के कट्टर प्रतिद्वन्द्वी भी । आप सोच रहे होंगे कि यदि ‘आप’ का फ़ुल फ़ार्म ‘आम आदमी पार्टी’ है, तो इस ‘बाप’ का क्या होगा ? अजी ‘बदनाम आदमी पार्टी’ के अलावा और क्या हो सकता है भला ? अब आप से मात्र इतना अनुरोध होगा, कि उधर जाते हुए ज़रा किसी पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवा कर, उसी तिथि में जन्तर-मन्तर के लान को बुक अवश्य कराते आएंगे, ताकि बाप जी यथाशीघ्र ‘बाप’ पार्टी की घोषणा कर सकें । तब तक होली भी आ ही जाएगी । धन्यवाद !

    Sumit के द्वारा
    December 17, 2013

    शाही जी@ आपके लिए बस इतना कहूंगा ” इतने दिनों बाद आप के दर्शन मिले, आपकी प्रतिक्रिया मिली, अच्छा लगा “

sadguruji के द्वारा
December 12, 2013

आप ने सही कहा है कि आम आदमी पार्टी कि स्थिति-“आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे” वाली हो चुकी है.राजनीती में आप किसी को अछूत समझते हैं तो आप को राजनीती में जाना ही नहीं चाहिए.दिल्ली की जनता को जल्द ही इस बात का एहसास हो जायेगा कि आप को वोट देकर उन्होंने दुबारा चुनाव होने और महंगाई बढ़ने की मुसीबत मोल ले ली है.एक तरह से आप को वोट देकर अपना कीमती वोट बर्बाद किया है.आप और भाजपा यदि सरकार नहीं बनाते हैं तो लोग यही सोचेंगे कि ये दोनों पार्टिया सिर्फ गाल बजाना जानती हैं,शासन करना तो सिर्फ कांग्रेस जानती है.जब भी चुनाव् होगा,कांग्रेस को फायदा मिलेगा.

    Sumit के द्वारा
    December 13, 2013

    सदगुरु जी@ आपकी बात से सहमत हूँ, सिर्फ आप गाल बजाना जानती है | आप ने जितने वादे किये है, सब अधूरे ही रेह जायेंगे, वैसे कल तक पता चल जायेगा अरविन्द जी के दिल में क्या है ?

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 12, 2013

राजनीती मुझे कुछ ख़ास समझ नहीं आती और अगर आती भी है तो मेरा इसमें कुछ ख़ास रस नहीं है…खैर…आपका लेख सुन्दर है…खुछ एक चीज़ों का पता चला जो अब तक पता नहीं था…!!!

    Sumit के द्वारा
    December 13, 2013

    राजनीति में रूचि न होते हुए भी, आपने अपनी प्रतिक्रिया दी उसके लिए धन्यवाद …

चिंतक के द्वारा
December 11, 2013

सुमित जी…आम आदमी पार्टी जिसने हर आमजन के दिल तक पहुँच कर, उनकी नई उम्मीद बनकर चुनाव लड़ा…वो अब ख़ुद से अलग विचारधारा की पार्टी के साथ गठबंधन कैसे कर सकती है ?? और मान लीजिये अगर कर भी लिया तो मीडिया ने अब तक वो सब ब्यान एवं रिकॉर्डिंग संभाल कर रख रखे होंगे जो ‘आप’ के नेताओं ने चुनाव पूर्व दिये थे और फिर ‘आप’ पर दूसरी तरह से कीचड़ उछालना शुरू कर दिया जाएगा । सो इससे अच्छा है कि अपनी कही गई बात पर रहकर दिल्ली में एक मजबूत एवं सुदृढ़ सरकार बनाने के बारे में सोचा जाये ।

    Sumit के द्वारा
    December 13, 2013

    चिंतक जी@ हालात मजबूर इधर भी और उधर भी … मगर ये भी सच है आप अपने कहे वादो पर खरा नहीं उतर सकती इसलिए ये सारे बहाने …………….

priti के द्वारा
December 11, 2013

अच्छा और सार्थक आलेख , दरअसल यही सवाल मेरे मन में भी हैं ,’आप’ के लिए.

    Sumit के द्वारा
    December 13, 2013

    शुक्रिया प्रीति जी,

Sumit के द्वारा
December 11, 2013

मेरे पहले राजनितिक आलेख पर आप सबकी प्रतिक्रिया के लिए मैं दिल से शुक्रगुज़ार हूँ

ANAND PRAVIN के द्वारा
December 10, 2013

आदरणीय सुमित भाई, नमस्कार सबसे पहले तो राजनीतिक लेख के लिए बधाई ………आप सब का बाप निकला किन्तु मेरा मानना है की हल्ला करना और काम करने में अंतर है…….अभी तक वो हिट एंड रन कर रहे थें अब क्या करेंगे वो विचारणीय है…….उनके लिए तो विपक्ष में बैठना ही अच्छा रहता क्युकी तब आसानी से वो हल्ला कर पातें और अपनी नीतियों का प्रचार और सरकार की नीतियों का विरोध करते रहतें……..पर अभी के समीकरण में कहीं बिहार के रामविलास पासवान वाला हाल ना हो जाए……जिन्होंने २००५ में आए मौके को फेंक दिया था…….अब देखिये आगे क्या होता है……..बधाई…..लिखते रहें

    Sumit के द्वारा
    December 11, 2013

    आनंद जी सही कहा आपने, “घोबी का कुत्ता घर का न घाट का” वाली बात सत्य हो जाये , आप को बात बढ़ाने की जगह अभी फैसला लेना चाहिए |

aksaditya के द्वारा
December 10, 2013

आदरणीय सिंह साहब के कमेन्ट से सहमत होते हुए , मेरा भी सोचना यही है की आप पार्टी का स्टेंड किसी के भी साथ नहीं जाने का, बिलकुल सही है| समर्थन देकर अपने से छोटे दलों को सरकार बनाने देने के मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों का पुराना रिकार्ड बहुत ही खराब है| आप एक नया राजनीतिक दल है, जो कुछ वायदों के साथ राजनीति में आया है और शुरुवात में ही अवसरवादी व्यवहार उसके अस्तित्व के लिए ही संकट बन सकता है, विशेषकर चालाक और घुटी हुई भाजपा, कांग्रेस और देश के दानव जैसे मीडिया उसे खत्म करने में कोई देर नहीं लगायेंगे| हमारे देश में सिद्धांत सिर्फ कथनों और पुस्तकों में ही सुशोभित हैं और व्यवहार से वैसे ही गायब हैं, जैसे गधे के सर से सींग और देश की जनता उसी अनुसार अकसर बुद्धि से कम और भावनाओं से ज्यादा व्यवहार करती है| यह हम राजनीति में सबसे अधिक चरितार्थ होते देखते हैं| ऐसी परिस्थिति में आप के द्वारा सत्ता के लिए थोड़ा भी हलचल करना, लोगों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करने के लिए अच्छे अवसर कांग्रेस और भाजपा को उपलब्ध कराएगा| इसलिए , आज कुछ भी हो और भविष्य में भी कुछ भी हो, आप को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद ही सरकार बनाने के बारे में सोचना चाहिए, चाहे कितनी भी देर क्यों न हो| 

    Sumit के द्वारा
    December 11, 2013

    क्या अरुण जी, ये आम जनता की परीक्षा नहीं होगी, आखिर कब तक इंतज़ार करेगी आम जनता ? यदि इंतज़ार ही करना था तो आप की जरुरत ही क्या थी, बदलाव का इंतज़ार तो जाने कब से कर रही है आम जनता |

    dineshaastik के द्वारा
    December 11, 2013

    आदरणीय @aksakitya जी, आपके एक एक शब्द से सहमत हूँ। सुमित जी , आपको बताना चाहता हूँ कि आम आदमी पार्टी केवल  राजनैतिक दल नहीं है, बल्कि एक व्यवस्था परिवर्तन की चाहत रखने वालों का संगठन है। आप की सफलता का एक सकारात्मक परिणाम तो हमें तुरन्त ही  प्राप्त हो गया कि कल्याण सिंह द्वारा यूपी में जोड़तोड़ कर और  सुखराम के पाँच विधायकों के साथ हिमाचल में सरकार बनाने   वाली बीजेपी आज नैतिकता की बात करने लगी है। जबकि हिमाचल में उस समय हिमाचल के प्रभारी नरेन्द्र मोदी थे। आप क्या चाहते हैं  कि आम आदमी को भ्रष्ट काँग्रेस और कमीशन खाने वाली तथा मंदिर और मस्जिद के नाम पर सत्ता पाने वाली बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना लेना चाहिये? जिससे जनता कहे  कि आम आदमी और इन भ्रष्ट दलों में कोई अंतर नहीं है। अरविन्द तो सत्ता का लालची है। आपने ABP न्यूज पर कल का सर्वे देखा होगा। जिसमें जनता ने आम आदमी को काँग्रेस या बीजेपी से मिलकर सरकार बनाने को नकार दिया। दिल्ली की जनता पूरे देश का प्रतिनिधि्त्व करती है। यहाँ के अधिकाँश लोग वैचारिक रूप से शिक्षित हैं। यहाँ धर्म और जाति का राजनीति का कोई अधिक प्रभाव नहीं है। यही कारण है कि मायावित का सूपड़ा साफ है। बीजेपी को जो सीट मिलीं हैं, वह बीजेपी या नरेन्द्र मोदी की जीत नहीं है। दिल्ली में नरेन्द्र मोदी ने  जहाँ जहाँ भी रैली की है वहाँ वहाँ से आम आदमी जीता है। बीजेपी यदि जीती है तो केवल कहीँ कहीँ आम आदमी कार्यकर्ताओं की आपसी गुटवाजी से या फिर इसलिये कि वहाँ कि जनता  ने यह समझा कि शायद आम आदमी को बोट देने से काँग्रेस न जीत जाये और मेरा वोट बरवाद चला जाये। यह भी एक सर्वे से विदित हुआ है। यहाँ हर उस आदमी के मुँह से जिसने बीजेपी को वोट दिया था, यही आवाज निकल रही है कि अबकी चुनाव में  केवल आम आदमी को वोट दिया जायेगा। सुमित जी, आपको शायद शादय विदित नहीं होगा कि इस बार आम आदमी की वजह से चुनाव में दारू और नोट बाँटने का प्रचलन नाम मात्र का ही रहा।

    December 12, 2013

    अशोक सर की बातों से शतप्रतिशत सहमत……………..

    Sumit के द्वारा
    December 13, 2013

    दिनेश जी@ सुनने में आ रहा है कि आप + कांग्रेस = सरकार ….. अब क्या कहना चाहते है आप ?

jlsingh के द्वारा
December 10, 2013

प्रिय सुमित जी, सादर! जहाँ तक मेरी समझ है और संविधान विशेषज्ञों की राय सुन पाया हूँ, पहली बड़ी पार्टी भाजपा है और निमंत्रण उसे जायेगा. अगर वह इंकार करती है तो निमंत्रण दूसरी बड़ी पार्टी AAP को जायेगा. जब ३२ सीट पाकर भाजपा सरकार बनाने का जोखिम नहीं उठा सकती फिर AAP कैसे उठा पायेगी. कहीं उसकी सरकार को गिरा दिया गया तो? बिना बहुमत की पार्टी बदलाव कैसे लायेगी. इसलिए अंतिम विकल्प राष्ट्रपति/राज्यपाल शासन ही है. सभी अपनी अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं. आम आदमी पार्टी को मिली अपार सफलता से वे और आम जनता भी खुश है पर एकाध कोली जैसे लोग अपनी खुशी को पचा नहीं पाते … जुलूस निकालने की जरूरत ही नहीं थी…. मैं भी यही कहूँगा …आगे आगे देखिये होता है क्या? अच्छा आलेख के लिए बधाई!

    Sumit के द्वारा
    December 11, 2013

    शुक्रिया जवाहर जी, मगर कही तो कोई कमी है, जिसे आप छुपा रही है | आपको ऐसा नहीं लगता ?

    dineshaastik के द्वारा
    December 11, 2013

    आदरणीय जवाहर जी, आपके विचारों से सहमत हूँ। यदि सरकार नहीं बनती  तो इसके लिये दोषी बीजेपी और काँग्रेस है। इनकी जन्म पत्री में इन दोनों के  सभी गुण मिलते हैं अतः इन दोनों को पारिग्रहण सूत्र में बँध जाना चाहिये। मुझे लगता है कि यह मिलकर सरकार चला भी सकते हैं।

allrounder के द्वारा
December 10, 2013

नमस्कार भाई सुमित, दिल्ली के ताजा चुनावों मैं आप पार्टी ने जितनी सीटें हासिल कि हैं … ये उनकी बहुत बड़ी और अप्रत्याशित सफलता है, इससे लगता है कि अब बड़ी पार्टियो को चेत जाना चाहिए जनता बदलाव चाहती है …. बेशक अरविन्द केजरी वाल और उनके सहयोगी इस जीत पर ख़ुशी मन सकते हैं किन्तु उनकी असली परीक्षा अब शुरू होगी अब तक उन्होंने दूसरों पर उंगलिया उठाई है अब जनता को उनसे अपेक्षा है यदि उनकी सरकार बनी तो ये अपेक्षाए और बढ़ जाएंगी ऐसे मैं देखना बड़ा ही रोचक होगा कि किस हद तक वो अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं… बहरहाल अरविन्द केजरीवाल को उनकी जीत पर और आपको आपके आलेख पर हार्दिक बधाई !

    Sumit के द्वारा
    December 11, 2013

    आगे आगे देखिये होता है क्या ? सही कहा आपने, मगर सचिन जी कही आप अति आत्मविश्वास का शिकार तो नहीं हो गयी है ?

yogi sarswat के द्वारा
December 10, 2013

मित्रवर सुमित जी , सर्वप्रथम राजनीतिक लेख लिखने के लिए शुभकामनाएं ! आप ये देखिये कि अरविन्द के अलावा आप किस आदमी को ज्यादा जिम्मेदार समझते हैं , यानि कि सर्वेसर्वा अरविन्द ही हैं तो फैसला पार्टी का नहीं अरविन्द का कहिये ! ये सर्वविदित सत्य है कि आप किसी और पर आसानी से आरोप लगा सकते हैं किन्तु जब आप खुद मैदान में होते हैं तो आपको असलियत का पता चलता है , यही कुछ “आप ” के साथ है ! वो सपनों के सौदागर तो हैं किन्तु असल में कितने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं ये देखने की बात होगी , हालाँकि मुझे संदेह है !

    nishamittal के द्वारा
    December 10, 2013

    सहमती योगी जी से

    Sumit के द्वारा
    December 11, 2013

    योगी भाई @ अभी आपको अग्नि परीक्षा से गुजरना है

dineshaastik के द्वारा
December 10, 2013

आप समर्थक चाहते हैं कि आप जैसे थे, वैसे ही रहें। आप (बीजेपी) जैसा चाहते हैं आप (आम आदमी) वैसे न बने। सुमित जी या तो आप सच्चाई को नहीं जानते या फिर  सच्चाई  को नजर अंदाज कर रहे हैं। बीजेपी और काँग्रेस में क्या आपको  अधिक अंतर दिख रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि ये एक ही  थैले के चट्टे बट्टे हैं। एक साँपनाथ तो दूसरा नागनाथ है।इनके नेताओं के आपस में राजनैतिक, पारिवारिक, व्यापारिक एवं  व्यावहरिक संबंध हैं। सरकारी योजनाओं में कमीशन की हिस्सेदारियां हैं। जहाँ तक आम आदमी का सवाल है वह   सत्ता परिर्वतन में नहीं  बल्कि व्यवस्था परिवर्तन में यकीन रखती है। यदि वह इनमें से किसी का  समर्थन लेती या देती है तो उसके लिये आत्महत्या  करने के समान है।अधिकाँश दिल्ली के आम आदमी की तो यही सोच हैजहाँ  तक आपने  मर्यादा में प्रतिक्रिया देने की बात कहीं तो मान्यवर यह बतायेंगे कि  वह मर्यादा कौन तय करेगा।पाखंडी धर्याचार्य या भ्रष्टनेता।मर्यादाओं का तो ये लोग उलंघन करते हैं और आप है कि आम आदमी पर  आरोप लगा देते हैं।

    Sumit के द्वारा
    December 10, 2013

    दिनेश जी @ कांग्रेस और बीजेपी का एक होना, जागती आँखों से सपना देखना जैसा है, मगर आप पार्टी ऐसे में चुप क्यों है ? सवाल तो सारे वही के वही है : यदि आप जनता की सेवा करना चाहती है तो क्यों नहीं सरकार बना रही है ? कही इसके पीछे अरविन्द जी का अपना स्वार्थ तो नहीं छुपा है ? कही अरविन्द जी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के सपने तो नहीं देख रहे है ? तभी ६ महीने और चाहिए आप पार्टी को ? अगर ६ महीने बाद भी पूर्ण समर्थन नहीं मिला तो क्या करेगी आप पार्टी ? इसी अडयल व्यवहार को अपनाये रहेगी यदि आप पार्टी तो ये अपने साथ साथ जनता का वक़्त और वोट दोनों बर्बाद करने जैसा होगा,

sinsera के द्वारा
December 9, 2013

सबसे पहली बात तो ये कि पार्टी का एजेंडा पार्टी बनाने के पहले ही तय होना चाहिए, फिर अगर फाउंडर प्रशासनिक सेवा में रह चुका हो तो उससे झोल-झाल कि उम्मीद नही होती…ऐसे में 6 महीने का समय मांगना , खुद अपने ऊपर भरोसा न होने का सूचक हो सकता है……अब इस देश को अमेरिकी चुनाव प्रणाली कि ज़रूरत है जहाँ उम्मीदवार आर्थिक , प्रशासनिक, सामरिक, अंतर्राष्ट्रीय हर क्षेत्र में अपने आप को प्रूव करते हैं तब उम्मीदवारी तय होती है….शेष, आगे आगे देखिये होता है क्या…..

    dineshaastik के द्वारा
    December 10, 2013

    आदरणीय सरिता जी, आपके अमेरिकी चुनाव प्रणाली के विचार पर सहमत हूँ।


topic of the week



latest from jagran