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हंगामा है क्यों बरपा

Posted On: 9 Aug, 2015 Others में

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सोने के गिरते भाव को लेकर मैं,  “मध्यमवर्गीय आम आदमी” अपने मन की बात आपके समक्ष रख रहा हूँ—–

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सोना बिखरते-बिखरते, सोना बत्तीसी से पुनः पच्चीस हज़ारी होकर बैठा है | ऐसे में सोने के मामले में मेरा नजरिया बिलकुल साफ़ है | सोने के बारे में मैं सिर्फ उतना ही जानता हूँ, जितना वो मेरे बारे में, लगभग ते ऑलमोस्ट एक दुसरे से अनजान | मुझे याद है, परम्परा को निभाते हुए, सगाई के वक़्त मुझे सोने की अंगूठी पहनायी गयी थी, जिसको शादी के बाद श्रीमती जी ने बैंक के लॉकर में ससुर जी
की निशानी के तौर पर रखवा दिया | उसके बाद शायद ही मेरी मुलाकात कभी सोने से हुयी हो |

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मैं अपने व्यक्तिगत सोने को छोड़कर (मेरी सगाई की अंगूठी ), सामाजिक सोने के बारे में बात करता हूँ | सोना जब अपने दाम को लेकर अग्रसर था, तब भी हाहाकार वाला ही माहौल था | जिस प्रकार महिलाओ को अपनी बढती उम्र का पता तब चलता है, जब मोहल्ले के उर्जावान युवा  उनको भाव देना बंद कर देते है | तब उन्हें अहसास होता है कि अब उनकी उम्र डिस्को की नहीं, चालीसा जपने की है, परन्तु फ़िलहाल सोने के उतार-चढाव को मापने का अभी तक तो कोई पैमाना नहीं बना, जो इस बात का पूर्वानुमान दे सके |

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सोना जब तेजी से अग्रसर था तब महिलाये भी पार्टियों, गली मोहल्ले में या अन्य महिलाओ के साथ खड़े हो कर, कनखियों से अपने जेवरों को निहार कर, आत्मप्रशंसा के तालाब में गोते लगा लेती थी, मगर गिरते सोने के भाव महिलाओ की इस आभा को  फ़ीका कर रहे है |

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गौरतलब है कि आज चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ है कि सोना गिर रहा है, मगर मैंने अभी तक न तो सोने की बूँदे गिरती देखी और न ही बर्फ़ | बहरहाल मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए सोने के भाव का गिरना बिलकुल भीषण गर्मी के अनुभव जैसा है | गर्मी जिस प्रकार सिर्फ महसूस की जा सकती है, ठीक उसी प्रकार मध्यमवर्गीय आम आदमी सिर्फ इस बात को महसूस कर के खुश हो सकता है कि सोना गिर रहा है |

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कभी कभी लगता है कि सोने की हालत बिलकुल साँप सीडी के खेल जैसी हो गयी है, जिसे 32,000 पर बैठे साँप ने ऐसा काटा कि वो सीधे 25,000  पर आ गया |

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और तो और अवसरवादियों, जमाखोरों और भ्रष्टाचारियो के लिए सोने का गिरना किसी जैकपोट के लगने से कम नहीं है क्योंकि सब भली-भाती जानते है आज नहीं तो कल, समय करवट लेगा और एक बार फिर सोना, “राक्षस बत्तीसी” बन ठहाके लगायेगा |

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विचारणीय बात तो ये है कि सोना बढ़ा ही क्यों था ? मध्यमवर्गीय आम आदमी तो पेट्रोल की गिरती कीमत से ही प्रसन्न हो जाता है | आलू-प्याज़ 10 रूपये किलो के निचे गिर जाए तो घरो में त्यौहार जैसा माहौल तैयार हो जाता है | परन्तु सोने के भाव का गिरना आत्मिक संतोष नही दे पा रहा है |

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जब हमारे देश में भाईचारा,  नैतिकता, आत्मसम्मान की भावना, राष्ट्र-प्रेम, बुजर्गो के प्रति आदर भाव, अनुसाशन जैसे बलशाली स्तम्भो के ध्वस्त होने पर कोई हो-हल्ला नहीं हुआ, तो ग्राम भर सोने के भाव गिरने पर इतना हंगामा है  क्यों  बरपा ? सोना पास रहे मगर चैन की नींद न आये, ऐसी सोना बत्तीसी जाप का क्या फायदा…….

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